<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-4899887448875290989</id><updated>2012-02-17T09:42:58.607+05:30</updated><title type='text'>छत्तीसगढ़ खबर | Chhattisgarh News</title><subtitle type='html'>NEWS FROM  RAIPUR | BILASPUR | SARGUJA | KORIA |MAHASAMUND | DURG | BASTAR |RAIGARH | JASHPUR | KORBA | KABIRDHAM |JANJGIR-CHAMPA | DHAMTARI | DANTEWADA |BIJAPUR | KANKER | NARAYANPUR | RAJNANDGAON</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://chhattisgarhdaily.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4899887448875290989/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chhattisgarhdaily.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Vandana</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>12</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4899887448875290989.post-7854942497336492143</id><published>2011-08-05T17:12:00.003+05:30</published><updated>2011-08-05T17:12:57.390+05:30</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="color: #990000;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;उद्योगों के लिये पूरा जिला खाली&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;सुनील शर्मा&amp;nbsp; जशपुर से&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर किसी ज़िले की पूरी आबादी को विस्थापित कर दिया जाये तो ? आपके पास इसका जो भी जवाब हो, कम से कम छत्तीसगढ़ में तो इस सवाल पर भी कोई बात नहीं करना चाहता. सिवाय उन आदिवासियों के, जो डरे हुये हैं और आक्रोशित भी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://raviwar.com/news/images/jashpur-meeting.jpg" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="144" src="http://raviwar.com/news/images/jashpur-meeting.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;अगर सब कुछ सरकार और औद्योगिक घरानों के मुताबिक ठीक-ठाक रहा तो आने वाले दिनों में छत्तीसगढ़ की साढ़े आठ लाख की आबादी वाला जशपुर जिला पूरी तरह से खाली करवा दिया जायेगा. इन साढ़े आठ लाख लोगों में शामिल 64 फीसदी उन आदिवासियों को भी खदेड़ने की तैयारी चल रही है, जो हज़ारों साल से जशपुर के इलाके में रहते आये हैं. जशपुर के लाखों आदिवासी सरकार से सवाल पूछ रहे हैं, उनसे जवाब चाहते हैं लेकिन राजधानी रायपुर से लेकर दिल्ली तक उनकी गुहार अनसुनी रह जा रही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गरीबी, लाचारी और अभावों की दिशा में नया इतिहास गढ़ने वाले इस जिले ने देश को कई आईएएस, आईपीएस के साथ कई उच्चाधिकारी दिये हैं लेकिन इनकी ताकत भी जशपुर में कमजोर पड़ रही है. जशपुर के भूगर्भ में खनिज संपदाओं का विपुल भंडार तो है ही यहां की नदियों में प्राकृतिक स्वर्णकण भी पाये जाते हैं. लेकिन प्रकृति की यह विरासत ही इन आदिवासियों के लिये मुश्किल का सबब बन गई है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले कुछ सालों से इस जिले में औद्योगिक घरानों ने अंधाधुंध तरीके से अपने विस्तार की तैयारी शुरु की है. यहां आने वाले 122 बड़े उद्योगों ने सरकार से उद्योगों की स्थापना के लिए 6023 वर्ग किलोमीटर जमीन की मांग की है. और जानते हैं, जिले का पूरा क्षेत्रफल कितना है ? कुल 6205 वर्ग किलोमीटर. यानी केवल 182 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र ऐसा है, जिसे औद्योगिक घराने बचे रहने देना चाह रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाहिर है, जिले की लगभग साढ़े आठ लाख की आबादी के पास, ऐसी स्थिति में कई सवाल हैं. आखिर सब कुछ खाली हो जायेगा तो लोगों का क्या होगा ? लोग कहां जाएंगे ? खेती की जमीन छीन जायेगी तो खेती किसमें करेंगे और खायेंगे क्या ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;हाल देश का&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;एक बड़ा सवाल तो यही है कि आखिर विकास की सारी विपदा आदिवासियों के हिस्से ही क्यों हैं ? देश में साढे आठ करोड़ सूचीबद्ध आदिवासी हैं जबकि ढाई करोड़ गैर सूचीबद्ध (डिनोटीफाइड)हैं यानी कुल लगभग 11 करोड़ आदिवासी हैं. पर इन आंकड़ों में सबसे महत्वपूर्ण है आदिवासियों का विस्थापन. जानकारों की मानें तो प्रत्येक दस में से एक आदिवासी आज वहां नहीं है, जहां वह पैदा हुआ था, जहां उसकी संस्कृति फल-फूल रही थी. न उसके पास अब जमीन है और न जंगल. पिछले एक दशक की ही बात लें तो औद्योगिक परियोजनाओं की स्थापना के कारण देश के महज चार राज्यों आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ, झारखंड और उडीसा में 14 लाख लोग विस्थापित हुये. इनमें 79 प्रतिशत लोग आदिवासी थे. तथ्य बताते हैं कि इस लोकतांत्रिक राष्ट्र में जनता के प्रति प्रतिबद्धता दर्शाने वाली सरकार ने 66 प्रतिशत विस्थापितों का पुनर्वास तक नहीं किया और उन्हें उनके हाल पर जानवरों की तरह मरने-जीने के लिये छोड़ दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डा.एम.एम.स्वामीनाथन द्वारा तैयार 'ड्राफ्ट पेपर' में चौंकाने वाले तथ्य हैं. यह रिपोर्ट बताती है कि देश में औद्योगीकरण और विकास से संबंधित विभिन्न परियोजनाओं के कारण वर्ष 1990 तक की अवधि में जो आदिवासी विस्थापित हुए उनका पूरी तरह पुनर्वास नहीं हुआ. विस्थापित आदिवासियों की कुल संख्या 85.39 लाख रही, जो कुल विस्थापितों का 55.16 प्रतिशत थी. विस्थापित आदिवासियों में 64.23 प्रतिशत अब भी पुनर्वास से वंचित है और अपनी जमीन एवं जड़ से उखडे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में भला छत्तीसगढ़ अलग कैसे होता ! छत्तीसगढ़ में भी सरकार उसी परंपरा के पालन की कोशिश कर रही है, जिसमें आदिवासियों की छाती पर उद्योग लगा कर कथित विकास की इबारत दर्ज की जाती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;जीवन का अधिग्रहण&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;जशपुर में औद्योगिक घरानों के लिये जमीन अधिग्रहण के खिलाफ शुरू से ही संघर्षरत सेवती पन्ना को जैसे सब कुछ मुंहजुबानी याद है. वह बताती हैं- "2008 में जमीन अधिग्रहण के लिए बगीचा ब्लाक के तेरह पंचायतों को नोटिस भेजा गया. इसमें गुल्लू भी शामिल था, जहां हाईड्रोइलेक्ट्रिक पावर प्लांट बनाने की तैयारी की जा रही है. नोटिस पंचायतों के सरपंच-सचिव के हाथ में दिया गया. तब तक उन्हें यह भी मालूम नहीं था कि जमीन अधिग्रहण क्या होता है ? नोटिस में साफ शब्दों में लिखा था कि यदि वे जमीन अधिग्रहण के संबंध में 7 अगस्त 2008 तक न्यायालय के समक्ष पंचायत का अभिमत पेश नहीं करेंगे तो उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी. लोग घबरा गए. उन्होंने पहले तो सभी तेरह पंचायतों की एक बैठक बुलाई फिर एक निजी कंपनी में बतौर असिस्टेंट मैनेजर काम कर चुके एक बुजुर्ग से इस बाबत सलाह ली. बुजुर्ग ने कंपनियों के जमीन अधिग्रहण की मंशा को स्पष्ट किया. बाद में खनिज संसाधनों का उत्खनन रोकने ग्रामीणों ने खुद से ही तहसील में जाकर उस नोटिस का जवाब दिया.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://raviwar.com/news/576_jashpur-chhattisgarh-industrialisation-sunil-sharma.shtml"&gt;www.raviwar.com पर पूरा लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें &lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4899887448875290989-7854942497336492143?l=chhattisgarhdaily.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chhattisgarhdaily.blogspot.com/feeds/7854942497336492143/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4899887448875290989&amp;postID=7854942497336492143' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4899887448875290989/posts/default/7854942497336492143'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4899887448875290989/posts/default/7854942497336492143'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chhattisgarhdaily.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title=''/><author><name>Vandana</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4899887448875290989.post-3274313051802750371</id><published>2010-03-13T16:04:00.004+05:30</published><updated>2010-03-13T16:12:14.438+05:30</updated><title type='text'>नक्सलियों से छत्तीसगढ़ के सवाल</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://raviwar.com/news/images/Maoist-bastar.jpg"&gt;&lt;img style="display: block; margin: 0px auto 10px; text-align: center; cursor: pointer; width: 426px; height: 184px;" src="http://raviwar.com/news/images/Maoist-bastar.jpg" alt="" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;कनक तिवारी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसमें इसमें कोई शक नहीं कि नक्सलवाद का सबसे सघन और भविष्यमूलक हमला छत्तीसगढ़ पर हो गया है. यह असर देश के सबसे बड़े भौगोलिक राज्य मध्यप्रदेश के इस दक्षिण पूर्वी हिस्से पर ही महसूस किया जाता था, लेकिन अविभाजित मध्यप्रदेश की लगभग 27 प्रतिशत की आबादी के आधार पर बने छत्तीसगढ़ के तिहाई हिस्से में नक्सलवाद की सक्रिय, चिंताजनक और विवादग्रस्त उपस्थिति है. 'नक्सलवाद' और 'माओवाद' शब्दों का घालमेल समझना जरूरी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोवियत गणराज्य और चीन समेत पूर्वी यूरोप तथा कुछ लातीनी अमेरिकी और दक्षिण एशियाई मुल्कों में मार्क्सवाद के बौद्धिक सिद्धांतों का परिणामकारी कम्युनिस्ट आंदोलन जीवन्त रहा है. इनमें से मुख्यत: चीन ने माओ त्से तुंग के नेतृत्व और उनसे भी ज्यादा उनके उत्तराधिकारी लिन पियाओ के बेहद हिंसात्मक दर्शन 'दुश्मन का उन्मूलन करो' का पाठ साकार करने की कोशिश की. नतीजतन सोवियत रूस के नेतृत्व से छिटकर चीन अपनी अहमियत का देश बना. उसने गुरिल्ला युद्ध की छापामार शैली को अपनाते हुए हिंसा की इतनी तल्ख वकालत की कि उसके राजदर्शन में असहमति का कोई स्थान ही नहीं रहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रूस और चीन के खेमों में कम्युनिस्ट आन्दोलन के बंट जाने का असर 1964 के आसपास भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के विभाजन और बाद में उसके कई धड़ों में टूटते जाने से हुआ. जिस तरह किसान मजदूर प्रजा पार्टी जैसी समाजवादी पार्टी के इतने धड़े हुए कि उन्हें गिन पाना मुश्किल हुआ, वही भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के साथ भी हुआ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1960 के दशक में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से उपजा चारु मजूमदार, कनु सान्याल, जंगल सन्थाल और सुशीतल राय चौधरी वगैरह दर्जनों बुद्धिजीवियों के नेतृत्व में कोलकाता के महाविद्यालयीन परिसरों में नक्सलवाद पुष्ट हुआ. 1972 के आसपास कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय के नेतृत्व में उसे इतनी बुरी तरह कुचल दिया गया जिसकी नक्सलियों को कल्पना नहीं रही होगी. सिद्धार्थ बाबू लेकिन चाणक्य नहीं थे. उन्हें घास की जड़ों में मठा डालने की भविष्यमूलकता नहीं मालूम थी. लिहाजा नक्सली आंदोलन नागभूषण पटनायक और नागी रेड्डी जैसे उड़ीसा और आंध्रप्रदेश के कई माओवादी नेताओं के हत्थे चढ़ गया. उसके बाद धीरे धीरे फैलता हुआ यह आंदोलन तत्कालीन मध्यप्रदेश के छत्तीसगढ़ अंचल में प्रवेश कर गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसका एक बड़ा कारण आंध्रप्रदेश की सरकार का रवैया था जिसकी कड़ाई की वजह से नक्सलियों को आंध्र की सीमा पार कर छत्तीसगढ़ आना अनुकूल हुआ. भोपाल से बस्तर की दूरी ने प्रशासन को वैसे ही ढीला ढाला रखा. कुल मिलाकर वह नक्सलियों के लिए अप्रत्यक्ष वरदान ही हुआ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ में लगभग 30 वर्षों में पला बढ़ा नक्सली आंदोलन अब बौद्धिक-राजनीतिक कम लेकिन यौद्धिक तेवर का ज्यादा दिखाई देता है. माओ और लेनिन ने यथासम्भव सुशिक्षित जनता की भागीदारी के बगैर जन आंदोलन का कभी समर्थन नहीं किया. माओ ने सदैव कहा कि जनता में क्रांति का आशय बुनियादी और अंतिम तौर पर जनता के राजनीतिक शिक्षण से है.&lt;br /&gt;&lt;a href="http://raviwar.com/news/297_question-from-maoist-kanak-tiwari.shtml"&gt;&lt;br /&gt;पूरा लेख पढें  www.raviwar.com पर&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4899887448875290989-3274313051802750371?l=chhattisgarhdaily.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='related' href='http://raviwar.com/news/297_question-from-maoist-kanak-tiwari.shtml' title='नक्सलियों से छत्तीसगढ़ के सवाल'/><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chhattisgarhdaily.blogspot.com/feeds/3274313051802750371/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4899887448875290989&amp;postID=3274313051802750371' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4899887448875290989/posts/default/3274313051802750371'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4899887448875290989/posts/default/3274313051802750371'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chhattisgarhdaily.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='नक्सलियों से छत्तीसगढ़ के सवाल'/><author><name>Vandana</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4899887448875290989.post-6131539564905245763</id><published>2009-12-11T18:01:00.003+05:30</published><updated>2009-12-11T18:18:28.200+05:30</updated><title type='text'>हिंसा बुनियादी तौर पर ग़लत है - विश्वरंजन</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://raviwar.com/baatcheet/images/vishwaranjan_chhattisgarh.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 263px; height: 185px;" src="http://raviwar.com/baatcheet/images/vishwaranjan_chhattisgarh.jpg" alt="" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color: rgb(102, 102, 102);"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;देश&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; में सर्वाधिक चर्चित पुलिस अधिकारियों में शुमार किये जाने वाले छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन &lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(102, 102, 102);"&gt;&lt;span&gt;मानते&lt;/span&gt; हैं कि बस्तर या देश के दूसरे हिस्सों में माओवादी बनाम राज्य का संघर्ष तभी खत्म हो सकता है, जब हिंसा को एकमात्र रास्ता मानने वाले लोगों की बुनियादी समझ में बदलाव आय़े. &lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(102, 102, 102);"&gt;&lt;span&gt;उनका&lt;/span&gt; मानना है कि माओवादियों से सैद्धांतिक रुप से लड़ना होगा और उनकी हिंसा से भी. लेकिन विश्वरंजन यह भी स्वीकारते हैं कि जब तक आर्थिक विषमता को दूर नहीं किया जाएगा, तब तक ऐसे चरमपंथी आंदोलन समाज में अपनी जगह बनाते रहेंगे. यहां पेश है, उनसे की गयी बातचीत.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;एक&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 0, 0); font-weight: bold;"&gt; कविता है- हिचकॉक और ज़िंदगी. एक समय था/ जब मुझे हिचकॉक द्वारा बनाया गया सिनेमा देखना/ अच्छा लगता था/ सिनेमा क्या ख़ून ही ख़ून/ चीख ही चीख/ एक बंदूक यहां / एक चाकू वहां / सिर पर लाठी का एक प्रहार/ और आसमान का लाल ही होते जाना सहसा/ कितना वीभत्स और/ कितना मज़ेदार/ आज नहीं देखता हूं मैं हिचकॉक की फ़िल्म/ आज हम सब ख़ुद हिचकॉक के पात्र बनते जा रहे हैं/ वीभत्स और मज़ेदार.&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;अपनी इस कविता को आप किस तरह analyze करेंगे. &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विश्वरंजन – देखिए कविता को तो हम कभी analyze नहीं करते हैं, लेकिन आप इसको इस तरह से देखिए कि जो संवेदनशीलता है हिंसा के प्रति हमारी इतनी भोथरी होती जा रही है समाज की, कि बहुत सारी चीज़ें हमें उद्वेलित ही नहीं करती है. हम खुद हिंसा में कहीं ना कहीं डूबते नज़र आ रहे हैं. और जो हमारी संवेदना है जीवन के प्रति या ज़िंदगी के प्रति, वो भोथरी हो रही है. हम जब एक कटा हुआ सिर देखते हैं, बस्तर के जंगलों में, कीड़े लगते हुए. वो मेरे spy का भी हो सकता है, किसी और का भी हो सकता है लेकिन पुलिस को जाना ही पड़ता है body लाने के लिए. हो सकता है 48 घंटे के बाद हम पहुँच रहे हैं और उस समय हम उसको अपने अंदर उतार भी नहीं पाते हैं. हम सब कहीं न कहीं हिंसा से इतने जुड़े हैं कि खुद हिचकॉक की फ़िल्म के पात्र बनते जा रहे हैं. जबकि हिचकॉक के पात्र आपको उद्वेलित करने के लिए, उस तरह के पात्र बनाए गये थे. हिचकॉक की फ़िल्म आपको कितनी भी मज़ेदार लगे, आपको एक स्तर पर इतनी उद्वेलित करती थी कि आप हिंसा के खिलाफ खड़े होते थे. आज हिंसा इस कदर फैल रही है समाज में, कि जो shock , जो झटका हमें मिलना चाहिए था, आज समाज में वो नहीं मिल रहा है. आज समाज में वो चीज़ नहीं आ रही है, समाज उसको एक सामान्य-सी हक़ीकत मानके बढ़ा चला जा रहा है. ये सोच था, ये महसूसता था, जब ये कविता लिखी गई थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://raviwar.com/baatcheet/B29_interview-cg-dgp-vishwaranjan-alokputul.shtml"&gt;छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्वरंजन से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4899887448875290989-6131539564905245763?l=chhattisgarhdaily.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='related' href='http://raviwar.com/baatcheet/B29_interview-cg-dgp-vishwaranjan-alokputul.shtml' title='हिंसा बुनियादी तौर पर ग़लत है - विश्वरंजन'/><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chhattisgarhdaily.blogspot.com/feeds/6131539564905245763/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4899887448875290989&amp;postID=6131539564905245763' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4899887448875290989/posts/default/6131539564905245763'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4899887448875290989/posts/default/6131539564905245763'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chhattisgarhdaily.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='हिंसा बुनियादी तौर पर ग़लत है - विश्वरंजन'/><author><name>Vandana</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4899887448875290989.post-639712207097389854</id><published>2009-10-05T13:13:00.002+05:30</published><updated>2009-10-05T13:16:33.779+05:30</updated><title type='text'>वेदांता की मौत की चिमनी</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://raviwar.com/news/images/vedanta_balco_mishap_aslam.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 270px; height: 180px;" src="http://raviwar.com/news/images/vedanta_balco_mishap_aslam.jpg" alt="" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;छत्तीसगढ़ के बालको में घरों को रौशन करने के लिए बनाई जा रही विशाल चिमनी ने ही सैकड़ों घरों को हमेशा-हमेशा के लिए अंधेरे में डूबा दिया है. इस घटना को दस दिन हो गये हैं लेकिन अब तक 41 मज़दूरों की हत्या की जिम्मेवारी तक तय नहीं हुई है. हालत ये है कि वेदांता की इस चिमनी में कितने मज़दूर काम कर रहे थे, इसका आंकड़ा भी छत्तीसगढ़ सरकार के पास नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;a href="http://raviwar.com/news/227_vedanta-balco-chimney-mishap-alok-putul.shtml"&gt;बालको नगर से आलोक प्रकाश पुतुल की रिपोर्ट&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://raviwar.com/news/227_vedanta-balco-chimney-mishap-alok-putul.shtml"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;आगे पढ़ें&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4899887448875290989-639712207097389854?l=chhattisgarhdaily.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chhattisgarhdaily.blogspot.com/feeds/639712207097389854/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4899887448875290989&amp;postID=639712207097389854' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4899887448875290989/posts/default/639712207097389854'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4899887448875290989/posts/default/639712207097389854'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chhattisgarhdaily.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='वेदांता की मौत की चिमनी'/><author><name>Vandana</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4899887448875290989.post-107816784702135955</id><published>2009-08-02T12:19:00.005+05:30</published><updated>2009-08-02T12:43:58.511+05:30</updated><title type='text'>मुख्यमंत्री रमन सिंह के नाम खुला पत्र</title><content type='html'>साभार : &lt;a href="http://raviwar.com/news/202_letter-chhattisgarh-cm-raman-singh-kanak-tiwari.shtml"&gt;रविवार.कॉम&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुख्यमंत्री जी,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_6AfUOdPaG0o/SnU76aIu0II/AAAAAAAAAAU/VfMMoaFMdlg/s1600-h/raman-singh-chhattisgarh-cm.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 196px; height: 148px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_6AfUOdPaG0o/SnU76aIu0II/AAAAAAAAAAU/VfMMoaFMdlg/s320/raman-singh-chhattisgarh-cm.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5365260405716209794" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span&gt;राज्य&lt;/span&gt; के पुलिस प्रमुख और अन्य प्रशासकीय तथा राजनीतिज्ञ सलाहकारों से सहमत होते हुए बुद्धिजीवियों और मानव अधिकार कार्यकर्ताओं को लगभग उलाहने के स्वर में आपने यही बार-बार आव्हान किया है कि वे राज्य सरकार की आलोचना करने के बदले नक्सलियों के खिलाफ क्यों नहीं लिखते. &lt;span&gt;आपकी&lt;/span&gt; 'रियाया' होने के कारण मैंने इस सलाह पर अमल किया है और समाचार पत्र इसके प्रमाण हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह अलग बात है कि नक्सली हिंसा के बरक्स राज्य की हिंसा एक बड़ा खतरनाक प्रयोग है जो आज़ादी के बाद से ही भारत की चिंता का विषय रहा है. छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद नासूर की तरह फैल गया है. वह मलेरिया के बुखार की तरह आए दिन मनुष्यता को ही तबाह करता है और बाकी दिन जब ऐसे बुखार की तरह तापमान छोड़ देता है जिसे सामाजिक थर्मामीटर माप नहीं पाता, तब सरकारी तंत्र के अत्याचार बदस्तूर कायम रहते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुख्यमंत्री जी, बुद्धिजीवी, मानव अधिकार कार्यकर्ता, लेखक और कलाकार किसी कौम, वंश या प्रतिबद्धता के नहीं होते. यदि होते हैं तो उनकी अभिव्यक्ति भोथरी हो जाती है. यह सुनना अच्छा लगता है कि राज्य सत्ता बुद्धिजीवियों को तुरही बजाकर विचारों के मूल्य युद्ध में जुट जाने का आव्हान करती है. क्या राज्य और बुद्धिजीवियों का इतना ही रिश्ता है कि बुद्धिजीवी केवल राज्य के कहने पर सरकारी अजान दें और राज्य एक बौद्धिक नूराकुश्ती या हमख्याली की खबरें प्रकाशित करता रहे. क्या राज्य ने कभी बुद्धिजीवियों से सहकार करने की कोशिशें की हैं? छत्तीसगढ़ निर्माण के बाद किसी सरकार ने कभी राज्य के हालात और भविष्य को लेकर अभिव्यक्ति के सिपाहियों से बात तक करने की जरूरत नहीं समझी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मानस-पुत्रों से मेरा आशय केवल उन कथित रचनाधर्मियों से नहीं है जो राज्य सत्ता पर निर्भर रहे बिना अपने अभिव्यक्त होने को निरर्थक मानते हैं. समाज के चिंतकों में सेवा निवृत्त बुजुर्गों, अध्यापकों, लेखकों, कलाकारों, सेवानिवृत्त फौजी और पुलिस अधिकारियों, शिक्षित उद्योगपतियों, खिलाड़ियों, अर्थशास्त्रियों, समाज सेवकों, राजनीति से तौबा कर चुके अनुभवी जनसेवकों, प्रबुद्ध महिलाओं, वैज्ञानिक नवोदय के तीक्ष्ण बुद्धि के युवजनों, विधि विशेषज्ञों, चिकित्सकों, इंजीनियरों तथा प्रयोगधर्मी कृषकों आदि की जमात से है. वे किसी भी सभ्य समाज की रचना, निरंतरता और विकास के स्थायी आधार स्तंभ होते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप छत्तीसगढ़ के माटी पुत्र होने के नाते हमारी स्थायी संपत्ति हैं. आयुर्वेदिक डॉक्टर के रूप में आप एक जागरूक जनसेवक हैं. राजनीतिज्ञ के रूप में आपने स्वेच्छा से एक बड़ी भूमिका का चुनाव किया है. लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी एक संयोग है. आपमें छत्तीसगढ़ के लिए ढेरों चिंताएं होंगी लेकिन छत्तीसगढ़िया होने से जो अनुभूति होती है, उसे मुख्यमंत्री की अभिव्यक्ति बनते बहुत गड़बड़ हो जाती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुख्यमंत्री जी, हमारे संविधान में राज्यपाल नामक पद है जिस पर यह बाध्यता है कि वह मंत्रि परिषद की सलाह से काम करेगा सिवाय कुछ महत्वपूर्ण मसलों को छोड़कर. मंत्रि परिषद पर ऐसी कोई बाध्यता नहीं है. कार्यपालिका के रूप में उसे नौकरशाहों को निर्देश देने के अधिकार हैं उनसे निर्देशित होने के नहीं. लेकिन अमूमन मंत्रि परिषदें नौकरशाहों पर उसी तरह निर्भर हो जाती हैं जिस तरह किसी भवन का प्रथम तल निर्भर होता है भूतल पर. यह क्यों होना चाहिए और क्यों हो रहा है? नक्सल समस्या को ही लें. सरकारी फाइलों पर ऊपर लिखित सभी तरह के नागरिकों और विधायिका के&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रतिनिधियों से सलाह मशविरे और उनकी भूमिका का नगण्य उल्लेख मिलेगा. उसमें नौकरशाही और पुलिसिया सिफारिशों की भरमार होगी. केवल क्रियान्वयन के अर्थ में नहीं सलाह देने के अर्थ में भी. नक्सल समस्या एक प्रदूषण है. वह प्रत्येक छत्तीसगढ़वासी के जीवन को तकलीफदेह बना रही है. जो भुक्तभोगी हैं उनसे क्या कभी कुछ मशविरा किया जाता है? या उन्हें इस लायक भी समझा जाता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुख्यमंत्री जी, यह आई ए एस और आई पी एस क़ी नौकरशाही सड़ी गली अंग्रेज व्यवस्था की देन है. गांधी जी ने इसका विरोध किया था और मौजूदा संसदीय पद्धति का भी. बीसवीं सदी की दुनिया की सबसे मशहूर कृति 'हिंद स्वराज' में तत्कालीन भारत की खस्ता हालत का उस ऐतिहासिक परेशान दिमाग व्यक्ति ने जो खाका खींचा था उसमें भविष्य के भारत के बीजाणु भी छितराए थे. क्या हमारी सरकारें जनता के साथ किया जाने वाला सलूक 'हिन्द स्वराज' के प्रस्थान बिन्दु के साथ स्वीकार करना चाहेंगी?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय संसदीय पद्धति में चुनाव जीतना और कुर्सियों पर फिट होना दुर्घटना, भाग्योदय या संयोग है. बर्फ की सिल्लियों को चट्टान समझने की भूल की जाती है. जो नागरिक हैं उन्हें केवल मतदाता समझ लिया जाता है. देश में भूकंप, बाढ़ या ज्वालामुखी फट पड़ने पर तबाही का शिकार जनता होती है. राजनेता उससे धैर्र्य रखने की अपीलें करते हैं. वह टैक्स देती है. भुखमरी झेलती है. महंगाई से कराहती है. आत्महत्या करती है. राजनीतिक क्षय के रोग के कारण पीली पड़ती चली जा रही है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन यदि वह उफ करती है तो उसे बगावत समझ लिया जाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुख्यमंत्री जी, इसमें कोई शक नहीं कि समाज के श्रेष्ठि वर्ग में नपुंसकता रही है. हमारी सदी के दो महानतम विचारकों विवेकानंद और गांधी ने अपनी तल्ख भाषा में इस ऐतिहासिक सत्य का उद्घाटन किया है. उन्होंने भारतीय संस्कृति, सभ्यता और पूरी भारतीयता का आधार किसानों, मजदूरों और गरीबों को माना है. साथ साथ महिलाओं और युवकों को भी. नक्सलवाद इन्हीं वर्गों पर श्रेष्ठि वर्ग का हमला नहीं तो और क्या है? राज्य सत्ता के अंग्रेजियत बुद्धि के कुछ नौकरशाह अपेक्षाकृत अल्प शिक्षित राजनीतिज्ञों को कंधे की तरह इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं तो और क्या है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तथाकथित नक्सलवाद के सरगना भारत के बाहर के कुछ उग्र राजनीतिक विचारों को एक अलग बौद्धिक, भौगोलिक और ऐतिहासिक संदर्भ में जबरिया ठूंसने का प्रयत्न कोई चालीस वर्षों से कर रहे हैं. यह विचारधारा पूरी तौर पर भारतीय परंपराओं और संविधान के विपरीत है. यह जनग्राह्य नहीं होती इसलिए नक्सली बंदूक का सहारा लेते हैं. सरकारें विचारधारा के स्तर पर मुकाबला करने के उपक्रम में सरकारी नुमाइन्दों द्वारा तैयार की गई प्रेस विज्ञप्तियां जारी करती हैं. वे नौकरशाह ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को संभालते हैं. लिहाज़ा होता यह है कि जो मुफलिस हैं वे अपने ऊपर सरकारी प्रचार को आक्रमण मानते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समाज एक सांस्कृतिक समास है. क्या नागरिक समाज इस अर्थ में सरकार का अंग नहीं हैं? उसकी केवल तमाशबीन की भूमिका क्यों समझी जाती है? सरकारें नक्सलवादियों से तो संवाद करना चाहती हैं लेकिन समाज के मानसपुत्रों से नहीं. सरकारी विज्ञप्तियां समाचार पत्रों के अतिरिक्त प्रदेश के चुनिंदा बुद्धिजीवियों को पृथक से नहीं भेजी जातीं. लेकिन नक्सलवादी बाकायदा ऐसा संपर्क उनसे करते रहते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब यदि किसी बुद्धिजीवी के पास नक्सली साहित्य, चिट्ठियां पर्चे, सीड़ी संयोगवश मिल गये (जिनको बुद्धि विलास की खुशफहमी में रहने के कारण नष्ट नहीं किया गया) तो वे बाकायदा नक्सलवादियों के रूप में पकड़ लिए जायेंगे. आपकी सरकार ने देश के इतिहास का सबसे खतरनाक जनविरोधी कानून भी बना रखा है. यह अलग बात है कि उसके बावजूद नक्सल गतिविधियां बढ़ती ही जा रही हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपकी सरकार ने देश के इतिहास का सलवा जूडूम नामक पहला प्रयोग भी कर रखा है. वह बढ़ते नक्सलवाद के सामने बौना पड़ता जा रहा है. हिंसा के खिलाफ जन प्रतिरोध एक सामाजिक लक्षण है. महात्मा गांधी ने तो अंग्रेज़ की हिंसा के खिलाफ उसको हवा दी थी और सफल रहे थे. क्या नक्सलवादी अंग्रेज़ शासकों से ज्यादा शक्तिशाली हैं और क्या छत्तीसगढ़ की जनता में हिंसा का प्रतिरोध करने की नीयत, कूबत और शक्ति समाप्त हो गई है. जो तटस्थ हो जाते हैं, वक्त उनका भी इतिहास लिख देता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुख्यमंत्री जी, नक्सली कहते हैं कि वे एक जन आंदोलन चला रहे हैं. चारु मजूमदार, कानु सान्याल और जंगल सन्थाल वगैरह के विचारों को मैंने पढ़ा है. नक्सलवाद को लेकर मुझ जैसे सैकड़ों बुद्धिजीवियों की अपनी अपनी निजी और सामूहिक समझ भी है. कवियों को केवल कविता पढ़ने की सरकारी फीस दी जाती है. तुलसी जयंती, निराला जयंती तथा ग़ालिब जयंती वगैरह के आयोजनों में जो शिरकत करते हैं उतनी ही बुद्धिजीविता की उनकी भूमिका समझी जाती है. विधान सभा अध्यक्ष और मंत्री उनसे सत्कार ग्रहण करते हैं. कशीदे पढ़वाते हैं. संस्कृति मंत्री पुरस्कार, अनुग्रह राशि और अनुदान देते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकार के नुमाइंदे अकबर की भूमिका में होते हैं और बुद्धिजीवी नवरत्नों की. इतिहास गवाह है कि आइने अकबरी में तुलसीदास के नाम का उल्लेख तक नहीं है. आज अकबर के नवरत्न कहां हैं? लेकिन तुलसीदास की रामचरित मानस मुफलिसों की झोपड़ियों में प्राणपद वायु की तरह प्रवाहित है. मंत्रि परिषदें आएंगी और जाएंगी. बड़े नौकरशाह और कुलपति वगैरह गैर छत्तीसगढ़िया होने के कारण अपने अपने प्रदेशों में लौट जायेंगे. शायद सेवानिवृत्त भूगोल में रह भी जायें. गरीब और लाचार लोग तो मृत्यु के बाद सचमुच कहीं नहीं रहेंगे. राजसत्ता विहीन जो प्रज्ञा पुरुष होते हैं वे ही इतिहास में दर्ज होते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंडित रविशंकर शुक्ल जैसे मंत्री और नरोन्हा जैसे नौकरशाह के कुछ अपवादों को छोड़कर सरकारें विस्मृति के तहखानों में कैद हैं. लेकिन 'छत्तीसगढ़िया सबसे बढ़िया' के मुहावरे को चरितार्थ करने वाले गुरु घासीदास, माधवराव सप्रे, गुंडा धूर, सुंदरलाल त्रिपाठी, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, मिनीमाता, ठाकुर प्यारे लाल सिंह, डॉ ख़ूबचंद  बघेल, कामरेड प्रकाश राय, कुंजबिहारी लाल अग्निहोत्री, स्वामी आत्मानंद, मुकुटधर पांडेय, देवकीनंदन दीक्षित, राजमोहिनी देवी, सुन्दरलाल त्रिपाठी, रामदयाल तिवारी, कामरेड रूईकर, हबीब तनवीर, रामचंद्र  देशमुख, पंढरी राव कृदत्त, नरसिंह प्रसाद अग्रवाल, शंकर गुहा नियोगी, मदन तिवारी, शानी, हरि ठाकुर जैसे कई चुनिंदा जननायक और बौद्धिक हैं जिनके वंशजों को 'सबसे बढ़िया छत्तीसगढ़िया' की शक्ल में सरकार द्वारा चुना जा सकता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ में कुल मिलाकर छत्तीस ऐसे समाज प्रतिनिधियों को रस्मी तौर पर ही चुना जा सके जिनसे यह अपेक्षा की जानी चाहिए कि वे आपके कभी कभार होने वाले आव्हान के अनुरूप सरकारी कोशिशों को सामाजिक सलाहों के अनुरूप लचीला और अमल योग्य बना सकें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुख्यमंत्री जी, तटस्थ, वस्तुपरक और संवेदनशील बुद्धिजीवी आपसे स्वयं होकर इन विषयों पर चर्चा करने के लिए समय मांगते रहे हैं लेकिन आपके संपर्क अधिकारी इन गुणों से लबरेज़ कहां हैं. इसलिए जन चौपाल में ऐसे पत्र लिखने की मुझे ज़रूरत महसूस हुई है. मुझे अब भी लगता है कि यदि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक इकाई को एक वैचारिक मनुष्य के रूप में तब्दील किया जाए तो छत्तीसगढ़ के उन निरीह, अशिक्षित और बेहद गरीब आदिवासियों को ज़रूरी समझाइश, आर्थिक उन्नयन, कानूनी सहायता और सामाजिक स्वीकार्यता के आयामों को सुदृढ़ करके नक्सलवाद से बचाया जा सकता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके लिए केवल सुरक्षा बलों की ज़रूरत नहीं होगी. पुलिस तो हमारी अतिरिक्तता है. वह समाज का अंतर्भूत अवयव नहीं है. सेना और पुलिस में जितनी कमी होगी समाज में उतनी ही सुदृढ़ता होगी. नक्सलवाद का नेतृत्व तो पड़ोसी राज्यों बंगाल, बिहार, आंध्रप्रदेश और उड़ीसा से आया है. उसका मूल छत्तीसगढ़ में नहीं है. आप आंकड़े उठाकर देखें जितने कथित नक्सली मारे गये हैं, उनमें इन पड़ोसी राज्यों के बल्कि और सुदूर प्रदेशों के कितने नक्सली शामिल हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ में जन युद्ध के नाम पर गृह युद्ध हो रहा है. बस्तर में ज्यादा और सरगुजा में कम. दोनों तरफ आदिवासी हैं. दोनों तरफ पेट भरने की लाचारी है. दोनों तरफ उनके हक तथा हिस्से की पूंजी में से राजनीतिक चौथ वसूली जा रही है. दोनों तरफ हिंसा का मुकाबला है और लगभग एक जैसे हथियारों से. नक्सलवादी की परिभाषा भी बहस मांगती है. जिनमें हिंसक विचार है कानून की दृष्टि से वे ही नक्सलवादी हैं. जो पूरी तौर पर निरक्षर हैं. छत्तीसगढ़ी तक नहीं जानते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत के किसी नेता को नहीं पहचानते हैं. जिनके पास तन ढंकने को वस्त्र नहीं है. जिनके जंगल टाटा और एस्सार समूह के आने वाले उद्योग छीन रहे हैं. जिनकी संस्कृति विदेशों में बिकाऊ माल की तरह खपाई जा रही है. हमारा महान करमा नृत्य सरकारी कार्यक्रमों में राज दरबार की वस्तु बनाया जा रहा है. आदिवासियों के चेहरे का भोलापन और मुस्कान भारतीय संस्कृति का उत्स रहा है. 'जयश्री राम' में विश्वास रखने वाले लोगों को तो शबरी के चरित्र के प्रति श्रद्धा होनी चाहिए और कुब्जा के प्रति भी. अंग्रेज़ी में जिसे बॉडी लैंग्वेज कहते हैं, उसी मासूम चेहरे के कारण ही तो आपकी लोकप्रियता है. उसमें से भी छत्तीसगढ़ की सहजता झांकती रहती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझ जैसे कई लोग हैं जिनके पास नक्सली समस्या की तह में जाकर उसके निदान के सुझाव होंगे लेकिन हमें सरकारी तामझाम से परहेज़ होता है. हममें से कुछ लोग नक्सलियों से भी बात कर सकते हैं बशर्ते उनमें गलत ही सही छत्तीसगढ़ी के निर्दोष विचार की अनुगूंजें तो हों. वे तो तालिबान की तरह धन की डकैती करते हैं और हमारे बेहद सीधे सादे आदिवासियों को फिदायीन दस्ते में तब्दील करते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकारी अफसर भी केवल बंदूक की गोली के दम पर नक्सलवाद को खत्म करने का शिगूफा छेड़ते रहते हैं. नक्सलवाद छत्तीसगढ़ की समस्या है, तो हर छत्तीसगढ़ी को अपने स्तर पर इस सामाजिक समस्या का आकलन और हल करने के लिए सुझाव देने का सांस्कृतिक अधिकार है. यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो आने वाली पीढ़ियां हमारे गुम हो गए चेहरों पर भी कोलतार का पोचारा फेरेंगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुख्यमंत्री जी, आपने केवल लिखने का आव्हान किया. हम लोग तो सरकार के साथ सहकार भी करना चाहेंगे. शर्त तो नहीं लेकिन झिझक यही है कि हमारी बौद्धिक सचेष्टता को तटस्थ, निष्पक्ष भविष्य मूलक और गहरे सरोकारों के साथ जुड़ी हुई समझा जाये. आप यही चाहेंगे तो मैं इब्तिदा करने के नाम पर एक नोट आपको भेज सकता हूं और कुछ प्रतिष्ठित सबसे बढ़िया छत्तीसगढ़ियों के नाम भी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनमें और कुछ नाम सरकार के अधिकार के अंतर्गत जोड़े घटाए जा सकते हैं. मैं समझता हूं कि बंद कमरों में तो केवल हथियारों की रणनीति को अंजाम दिया जा सकता है. लेकिन नक्सलवाद तो खूंरेजी का खुलेआम खेल है. एक सार्थक वैचारिक जन आंदोलन छत्तीसगढ़ के राजनीतिक वातावरण को ज्यादा विषाक्त होने से बचा सकता है. जिन्हें इसी मिट्टी में दफ्न होना है उनके लिए यह एक कर्तव्यगत सरोकार है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम जैसे बूढ़ों के पास कम समय बचा है. उन्हें यह सरोकार और ज्यादा सघन लगता है. छत्तीसगढ़ की खनिज संपदाएं, वन, पानी, बोली, संस्कृति वगैरह तो कुदरत ने हमें दी है जिन्हें भविष्य की पीढ़ियों के लिए हमें सुरक्षित रखना है. आंख मूंदकर पूंजीपतियों को बेचना नहीं है. राजनीतिक भ्रष्टाचार, नौकरशाही के अत्याचार, प्रदूषण, शराब के ठेके, पुलिसिया जुल्म, नेताओं के चोचले, बुद्धिजीवियों की निराशा, योजनागत अदूरदशर्िता, दफ्तरी लाल फीताशाही, तरह तरह के घोटाले, सामाजिक हिंसा, बौद्धिक बौनापन, असंवेदनशीलता, संकुचित दृष्टिकोण वगैरह तो वे मानव उत्पाद हैं जिन्हें हमने खासतौर पर छत्तीसगढ़ की विश्वप्रणम्य आदिवासी संस्कृति पर लाद दिया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप हमारे प्रदेश के इतिहास के उस दौर के मुख्यमंत्री हैं जब ये सभी आरोप काल हम पर थोप रहा है. संविधान के जन समर्थन और राजनीतिक दौर में आप को ये जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं. आपसे कंधे से कंधा लगाकर भविष्य को अनुकूल बनाने की जो चुनौतियां हैं उनके प्रति मेरी तरह के हर नागरिक का फर्ज़ बनता है. हमने ठीक  तरह से आज तक मुख्यमंत्री निवास और मंत्रालय देखा तक नहीं है जबकि विनिबंधनुमा इस पत्र में लिखे गये मुद्दों को लेकर हमारे सचेष्ट अनुरोध रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुख्यमंत्री जी, इस पत्र पर पता तो आपका है लेकिन पता नहीं इस पत्र का क्या होगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपका एक मतदाता मात्र समझा जाता हुआ नागरिक&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;कनक तिवारी&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4899887448875290989-107816784702135955?l=chhattisgarhdaily.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chhattisgarhdaily.blogspot.com/feeds/107816784702135955/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4899887448875290989&amp;postID=107816784702135955' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4899887448875290989/posts/default/107816784702135955'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4899887448875290989/posts/default/107816784702135955'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chhattisgarhdaily.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='मुख्यमंत्री रमन सिंह के नाम खुला पत्र'/><author><name>Vandana</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_6AfUOdPaG0o/SnU76aIu0II/AAAAAAAAAAU/VfMMoaFMdlg/s72-c/raman-singh-chhattisgarh-cm.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4899887448875290989.post-7123969716004299815</id><published>2009-07-10T17:04:00.002+05:30</published><updated>2009-07-10T17:25:21.265+05:30</updated><title type='text'>आदिवासी लड़कियों के साथ रोज़ एक शाइनी</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;साभार :&lt;/span&gt; &lt;a href="http://raviwar.com/news/187_human-trafficking-shiny-ahuja.shtml"&gt;रविवार.कॉम&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ की नाबालिग लड़कियों को महानगरों में घरेलू नौकरानी का काम देने के झांसे से ले जाने के बाद उन्हें अंधेरी कोठरी में ढ़केल देने का खेल सालों से चल रहा है &lt;span&gt;लेकिन&lt;/span&gt; शाइनी आहूजा प्रकरण से यह सवाल फिर खड़ा हो गया है. अगर जशपुर, सरगुजा और कोरबा के गांवों में आप जाएं तो आपको इन इलाकों से गायब आदिवासी लड़कियों के साथ हर रोज़ एक शाइनी के किस्से मिल जाएंगे.&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_6AfUOdPaG0o/Slcqlbhs5-I/AAAAAAAAAAM/PV_5o3inepU/s1600-h/human-trafficking-tribal-girls.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 181px; height: 136px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_6AfUOdPaG0o/Slcqlbhs5-I/AAAAAAAAAAM/PV_5o3inepU/s320/human-trafficking-tribal-girls.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5356797104313133026" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;इसे संयोग ही कहा जाएगा कि जिस समय शाइनी आहूजा प्रकरण चर्चा में था, उसी समय लड़कियों की मंडी के कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ के जशपुर में मुंबई पुलिस का एक दल बंधक बनाई गई लड़की को छोड़ने के लिए आया हुआ था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ उत्साही पत्रकारों ने अपनी कल्पना शक्ति का सहारा लिया और छत्तीसगढ़ के अख़बारों में 19 मार्च को सुर्खियां रही कि मुम्बई के फिल्म स्टार शाइनी आहूजा ने जिस लड़की से बलात्कार किया, वह छत्तीसगढ के जशपुर जिसे के अंतर्गत आने वाले डूमरटोली गांव की रहने वाली है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसा कि जशपुर के पुलिस अधीक्षक अक़बर राम कोर्राम बताते हैं- “ शाइनी आहूजा प्रकरण के बाद मुम्बई से पुलिस की एक टीम डूमरटोली आई थी, लेकिन इसका शाइनी प्रकरण से कोई सम्बन्ध नहीं है. वह एक लड़की को मुम्बई से यहां छोड़ने पहुंची थी, जो पिछले 9 मार्च से गायब थी. इस लड़की का नाम गायत्री है और वह अपनी एक सहेली अनीमा के बहकावे में आकर मुम्बई चली गई थी.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनीमा के कुछ परिचितों के ज़रिये गायत्री का पता चला और उसे डूमरटोली लाकर उनके परिजनों को सौंप दिया गया. लड़कियों को ट्रैफेकिंग से बचाने और उन्हें सीमित साधनों के बीच दिल्ली, मुम्बई, गोवा जैसे महानगरों से छुड़ाकर लाने वाली जशपुर की सामाजिक कार्यकर्ता एस्थेर खेस का कहना है कि शाइनी प्रकरण के बीच मुम्बई की पुलिस का जशपुर पहुंचने से यह फिर साफ़ हो गया है कि वहां बड़ी तादात में घरेलू नौकरानियों के रूप में काम करने वाली लड़कियां छत्तीसगढ़ से गई हुई हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;हज़ारों शिकार&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुश्री खेस कहती हैं कि शाइनी ने जिस लड़की को शिकार बनाया वह गायत्री तो नहीं है, लेकिन हमारे पास दर्जनों ऐसे मामले हैं जिनमें सबूत है कि जशपुर की लड़कियों को घरेलू काम कराने के बहाने से न केवल देश के भीतर बल्कि कुवैत और जापान तक ले जाए गए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली और गोवा जा पहुंची कई लड़कियों का सालों से पता नहीं है और उनके मां-बाप दलालों के दिए फोन नम्बर और पतों पर सम्पर्क नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि इनमें से ज़्यादातर फर्ज़ी हैं. लड़कियों को ले जाने के बाद प्लेसमेंट एंजेंसियों के दफ्तरों में फिर कोठियों में इन लड़कियों को 24 घंटे रखा जाता है. जब घर में पुरूष सदस्य अकेले होते है तो उनके साथ बलात्कार किया जाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनको ठीक से भोजन, कपड़ा तक नहीं मिलता, इन्हें कोई छुट्टी नहीं मिलती. इनका वेतन दलालों के पास जमा कराया जाता है. लड़कियों को अपने घर लौटने का रास्ता पता नहीं होता इसलिये वे सारा ज़ुल्म चुपचाप सहती हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुश्री खेस का यह भी कहना है कि दिल्ली में 150 से ज्यादा प्लेसमेंट एजेंसियां काम कर रही हैं जो झारखंड, पश्चिम बंगाल और उत्तर छत्तीसगढ़ से लड़कियों को बुलाते हैं. इनके एजेंट का काम इन लड़कियों के वे रिश्तेदार करते हैं, जो कई साल पहले से ही इन महानगरों में काम कर रहे होते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;नया ट्रैफेकिंग कानून&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ महिला आयोग की अध्यक्ष विभा राव राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष गिरिजा व्यास के इस बयान से सहमत हैं कि गरीब नाबालिग लड़कियों को शोषण का शिकार होने से बचाया जाए. श्रीमती राव को यक़ीन है कि अब देशभर में घरेलू नौकरानियों की सुरक्षा को लेकर नई बहस छिड़ेगी. उनका कहना है कि इस समस्या से छत्तीसगढ़ सर्वाधिक प्रभावित राज्यों में से एक है, इसलिय़े वे चाहती हैं कि ट्रैफेकिंग को लेकर भी मौजूदा कानूनों की समीक्षा की जाए और इसे रोकने के लिए प्रावधान कड़े किए जाएं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रीमती राव ने शाइनी आहूजा प्रकरण में छ्त्तीसगढ़ की लड़की के शिकार होने की अफवाह के बाद जशपुर कलेक्टर और एस पी को पत्र लिखकर पूरे मामले का प्रतिवेदन देने के लिए भी कहा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वास्तव में घरेलू नौकरानियों की सुरक्षा व ट्रैफेंकिंग रोकने के ख़िलाफ एक कानून पिछली सरकार में ही बन जाना था. तत्कालीन केन्द्रीय महिला बाल विका मंत्री रेणुका चौधरी ने जून 2007 तक इस कानून का ख़ाका तैयार करने के लिए देशभर में सक्रिय महिला संगठनों से सुझाव मांगा था. लेकिन प्रस्ताव भेजने के बाद क्या हुआ यह किसी को नहीं मालूम.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ट्रैफेंकिंग के ख़िलाफ ही काम कर रहीं कुनकुरी की अधिवक्ता सिस्टर सेवती पन्ना का कहना है कि उनसे भी सुझाव मंगाए गए थे लेकिन उसका क्या हुआ उन्हें पता नहीं. इसमें उन्होंने महानगरों से छुड़ा कर लाई जाने वाली लड़कियों के पुनर्वास के लिए भी पुख़्ता उपाय सुझाए थे, क्योंकि देखा गया है कि महानगरों में रहकर लौटने वाली लड़कियां गांवों में व्यस्त न होने के चलते विचलित रहती हैं. वे यहां दुबारा घुल-मिल नहीं पाती और दुबारा महानगरों की तरफ भागने का रास्ता तलाश करती हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, शाइनी आहूजा प्रकरण ने एक मौका और दिया है कि छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल से तस्करी कर महानगरों में भेजी जा रही लड़कियों की सुरक्षा के लिए ज़रूरी कदम उठाएं जाएं.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4899887448875290989-7123969716004299815?l=chhattisgarhdaily.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chhattisgarhdaily.blogspot.com/feeds/7123969716004299815/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4899887448875290989&amp;postID=7123969716004299815' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4899887448875290989/posts/default/7123969716004299815'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4899887448875290989/posts/default/7123969716004299815'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chhattisgarhdaily.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='आदिवासी लड़कियों के साथ रोज़ एक शाइनी'/><author><name>Vandana</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_6AfUOdPaG0o/Slcqlbhs5-I/AAAAAAAAAAM/PV_5o3inepU/s72-c/human-trafficking-tribal-girls.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4899887448875290989.post-2714239688963292762</id><published>2009-03-23T15:36:00.002+05:30</published><updated>2009-03-23T15:46:28.732+05:30</updated><title type='text'>धान के कटोरे में बीड़ी</title><content type='html'>&lt;a href="http://raviwar.com/news/119_small-farmers-troubled-chhattisgarh-rahul-banerjee.shtml"&gt;साभार : रविवार.कॉम&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंद्रह साल पहले जब मैं पहली बार शादी के बाद कांकेर जिले में मेरी पत्‍नी सुभद्रा के गांव जेपरा गया था तो मेरा स्‍वागत बीड़ी, तेंदु पत्‍ते और तम्‍बाकू से भरे एक सूपड़ा से हुआ था. यह इसलिए कि सुभद्रा के पुश्‍तैनी घर में घुसते ही बरामदे में उसकी बीड़ी बनाती हुई भाभी हमें देखकर उस सूपड़े को हाथ में लेकर स्‍वागत के लिए उठी थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; वर्षा ऋतु थी जो कि धान की खेती करने वालों के लिए बहुत व्‍यस्‍त समय है. इसलिए मुझे आश्‍चर्य हुआ था कि सुभद्रा की भाभी खेत में काम करने के बजाय घर में बैठ कर चंचल उंगलियों से बीड़ी बना रही थी. &lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://raviwar.com/news/images/beedi-chhattisgarh.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 256px; height: 199px;" src="http://raviwar.com/news/images/beedi-chhattisgarh.jpg" alt="" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; समय बरसात के दिनों में जेपरा तक कोई मोटर वाहन नहीं चलता थी क्‍योंकि बीच में महानदी पड़ती था एवं उस पर कोई पुल नहीं था. &lt;span&gt;इसलिए&lt;/span&gt; हम दोनों हमारे बैगों को सर पर रखकर पैदल ही 12 किलोमीटर चलकर एवं महानदी को नाव से पार कर जेपरा पंहुचे थे. फलस्‍वरूप मैंने तुरंत, मेरे हिसाब से बेमौसम, बीड़ी बनाने के इस कवायद के पीछे के रहस्‍य को जानने की कोशिश नहीं की थी. पर कुछ दिन बीतने के बाद मैंने भाभी को पूछ ही डाला कि खुद के खेत होते हुए भी वह उस में काम क्‍यों नहीं कर रही है. जो जवाब हमें मिला उसने छत्‍तीसगढ़ के छोटे एवं सीमांत किसानों की दर्दनाक हकीकत को उज़ागर कर दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक हेक्‍टेयर खेत के मालिक मेरे साले ने उस खेत को सालाना मुनाफे पर किसी और किसान को दे दिया था. इतने छोटे एक फसली खेत के लिए बैल जोड़ी एवं अन्‍य कृषि उपकरण रखने का कोई अर्थ नहीं होता है. और किराये पर बैल जोड़ी लेकर मजदूरों से काम करवाने से जो उत्‍पादन होता है, उससे ज्‍यादा खेत को मुनाफे में देकर मिल जाता है. इसके अलावा घर में ही बैठकर बीड़ी बनाकर अतिरिक्‍त कमाई भी हो जाती है जिसके लिए खेत के कीचड़ में गंदा नहीं होना पड़ता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छत्‍तीसगढ़ के करीब 60 प्रतशित कृषक परिवार दो हेक्‍टेयर से कम जमीन के मालिक है एवं यह भी ज्‍यादातर एक फसली है. फलस्‍वरूप इन सभी के सामने सुभद्रा के भाई के जैसे ही संकट है कि कृषि कार्य से पर्याप्‍त आमदनी नहीं हो पाती है. ऐसे में बड़ी संख्‍या में कृषक खेती बारी छोड़कर अन्‍य कृषकों को अपनी जमीन मुनाफे या भाग से दे देते है एवं खुद या तो पलायन कर जाते है और नहीं तो बीड़ी बनाकर जीवन यापन करते है. परंतु बीड़ी बनाने का काम ही क्‍यों और कुछ क्‍यों नहीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीड़ी का एक प्रमुख कच्‍चा माल है तेंदु पत्ता. यह छत्‍तीसगढ़ के जंगलों में प्रभूत परिमाण में उपलब्‍ध है एवं ज्‍यादातर गरीब आदिवासियों के सस्‍ते श्रम से यह एकत्रित होता है. इन आदिवासियों के पास भी गर्मी के मौसम में तेंदु पत्‍ता एकत्रित करने के अलावा कोई दूसरा रोजगार नहीं होता है. इसलिए भूखे मरने के बजाए यह लोग बेहद सस्‍ती दरों पर यह काम करते है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यानी छत्‍तीसगढ़ के बीड़ी निर्माता कम्‍पनियों को तेंदु पत्‍ता संग्राहक एवं घर में बैठकर बीड़ी बनाने वाले दोनों ही बहुत कम कीमत में उपलब्‍ध हो जाते है एवं वह बीड़ी भी इसलिए भारत के अन्‍य बीड़ी निर्माता कम्‍पनियों की तुलना में कम कीमत में बेच सकते है. ऐसे में आश्‍चर्य नहीं कि छत्‍तीसगढ़ में बीड़ी उद्योग फलफूल रहा है एवं परिस्थितियां ऐसी हो गई है कि नए दामादों का स्‍वागत धान से नहीं बल्कि बीड़ी के अवयवों से भरे सूपड़ों से होता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छत्‍तीसगढ़ में किसानी की इस दुर्दशा के पीछे एक बहुत बड़ी अंतर्राष्‍ट्रीय साजिश है. अमरीकी बहुराष्‍ट्रीय कम्‍पनियों के इशारों पर अंतर्राष्‍ट्रीय कृषि अनुसंधान केंद्रों ने रासायनिक खाद से पैदा होने वाले संकरित किस्‍म के चावलों को पूरे छत्‍तीसगढ़ में फैला दिया जिससे छत्‍तीसगढ़ की पारम्‍परिक कृषि ठप्‍प हो गई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस पारम्‍परिक कृषि में कमी तकनीक की नहीं बल्कि पूंजी निवेश की थी क्‍योंकि साहुकारों के चंगुल में फंसे होने के कारण छोटे किसानों के पास अपनी खेतों को विकास कर उन्‍हें दो फसली बनाने हेतु संसाधन नहीं थे. परंतु भारत सरकार साहुकारों पर लगाम कसने और पारम्‍परिक कृषि को बढ़ावा देने के बजाय बहुराष्‍ट्रीय कम्‍पनियों के व्‍यापारिक हितों को ज्‍यादा तौल दिया क्‍योंकि इन हितों के साथ छत्‍तीसगढ़ के चावल और बीड़ी बेचने वाले व्‍यापारियों के हित भी जुड़े हुए थे. आम किसान अगर आर्थिक रूप से कमजोर एवं भूखा रहता है तो श्रम का मूल्‍य भी कम रहता है जिससे देशी से लेकर विदेशी सभी प्रकार के व्‍यापारियों को फायदा होता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छत्‍तीसगढ़ में कृषि केवल एक जीविकोपार्जन का माध्‍यम नहीं बल्कि एक सम्‍पूर्ण जीवनशैली थी जिसमें जमीन एवं पानी का संरक्षण भी शामिल था. इसीलिए ग्रामीण समुदाय एक दूसरे से हाथ मिलाकर तालाबों और खेतों की इतनी हिफाज़त से देखभाल करते थे. परंतु जब कृषि को व्‍यापार में बदल दिया गया एवं कृषक को श्रमिक में तो यह जीवनशैली भी ध्वस्‍त हो गई एवं ग्रामीण छत्‍तीसगढ़ में बीड़ी निर्माण का बोलबाला हो गया. वर्तमान में परिस्थितियां विकराल है एवं ग्रामीण छत्‍तीसगढि़यों का औसत आय देश में सबसे कम है एवं वे विश्‍व में सब से ज्‍यादा कुपोषितों में शुमार होते है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छत्‍तीसगढ़ सरकार द्वारा इस संकट से जूझने के लिए गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों को तीन रुपए प्रति किलो के हिसाब से 35 किलो चावल प्रति माह मुहैया कराया जा रहा है. परंतु यह एक अस्‍थायी एवं अपर्याप्‍त समाधान है. असली जरूरत यह है कि कृषि की बुनियाद को ही पुख्‍ता किया जाए ताकि छोटे किसान एक बार फिर खुशी के साथ खेती करने लगे और उसी से अपना गुजारा अच्‍छे ढंग से कर पाए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके लिए अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही व्‍यापारिक दुराग्रह से ग्रसित शासन एवं नियोजन प्रणालियों को बदलकर आम जनता को स्‍वावलम्‍बी जीवन यापन करने के पूर्वाग्रह से सुशोभित शासन एवं नियोजन प्रणालियों को अपनाना होगा. बीड़ी के बदले चावल के चीले का सेवन ज्‍यादा हो इस ओर ध्‍यान देना होगा. एक हेक्‍टर भूमि वाला किसान भी उसका परिवार अच्‍छे ढंग से चला पाए इसके लिए जो कदम जरूरी है उसे अपनाना होगा. यह कदम सभी को मालूम है– इमानदारी से ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का भरपूर इस्‍तेमाल कर पारम्‍परिक कृषि एवं उससे जुड़ी विकेंद्रीकृत भू एवं जल प्रबंधन योजनाओं का क्रियान्‍वयन करना. परंतु इसे क्रियान्वित करने की इच्‍छाशक्ति लगता है जनता और शासकों में किसी में भी नहीं है और इसीलिए बीड़ी के कश लेकर ही लोग अपने दु:खों को भुलाने की कोशिश कर रहे है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;लेखक&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; : राहुल बैनर्जी&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4899887448875290989-2714239688963292762?l=chhattisgarhdaily.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='related' href='http://raviwar.com/news/119_small-farmers-troubled-chhattisgarh-rahul-banerjee.shtml' title='धान के कटोरे में बीड़ी'/><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chhattisgarhdaily.blogspot.com/feeds/2714239688963292762/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4899887448875290989&amp;postID=2714239688963292762' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4899887448875290989/posts/default/2714239688963292762'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4899887448875290989/posts/default/2714239688963292762'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chhattisgarhdaily.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title='धान के कटोरे में बीड़ी'/><author><name>Vandana</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4899887448875290989.post-159055128550691362</id><published>2009-01-09T18:02:00.003+05:30</published><updated>2009-01-09T18:10:16.705+05:30</updated><title type='text'>सिंगूर के बाद अब बस्तर को टाटा ?</title><content type='html'>साभार : &lt;a href="http://www.raviwar.com/"&gt;रविवार.कॉम&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;तो&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;क्या&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;अब&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;बस्तर&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;की&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;बारी&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;है&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; ?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;सिंगूर&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; से टाटा संयंत्र की विदाई के बाद पिछले साढ़े तीन सालों से आदिवासियों का विरोध झेल रहा टाटा इस्पात संयंत्र अब ब&lt;span&gt;&lt;span&gt;स्तर&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; को भी टाटा करने की सोच रहा है. बस्तर में इस्पात संयंत्र लगाने के लिए टाटा ने 4 जून 2005 को छत्तीसगढ़ सरकार के साथ समझौता किया था लेकिन आदिवासियों के लगातार विरोध के कारण अब तक टाटा सं&lt;span&gt;&lt;span&gt;यंत्र&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; को बस्तर में इस्पात संयंत्र लगाने के लिए ज़मीन ही नहीं मिल पाई है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://raviwar.com/news/images/tata-e.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 184px; height: 148px;" src="http://raviwar.com/news/images/tata-e.jpg" alt="" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;ज़मीन&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; के लिए आदिवासियों को मुआवजा देने और तरह-तरह के प्रलोभन देने से लेकर, झुठे मुकदमे दर्ज करने, जेल भेजने, मारने-पीटने के सारे दांव-पेंच अपनाये गये लेकिन आदिवासियों का विरोध कम होता नहीं नजर आ रहा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टाटा स्टील के छत्तीसगढ़ प्रोजेक्ट के उपाध्यक्ष वरुण झा की मानें तो पिछले चार सालों में भी सरकार ज़मीन उपलब्ध नहीं करा पाई है और संयंत्र की लागत लगातार बढ़ती चली गई है. ऐसे में अगर सरकार ने ज़मीन उपलब्ध कराने के लिए समय सीमा नहीं तय की तो टाटा स्टील बस्तर से विदा लेने में देर नहीं करेगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस्तर में टाटा इस्पात संयंत्र पहले दिन से ही विरोध झेल रहा है. असल में राज्य सरकार के साथ हुए एमओयू ने ही इसे विवादों के केंद्र में खड़ा कर दिया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में राज्य सरकार और टाटा स्टील कंपनी के बीच एक एमओयू में हस्ताक्षर के साथ घोषणा हुई कि टाटा स्टील बस्तर में 10 हजार करोड़ रुपए की लागत से प्रथम चरण में 2 मिलीयन टन और भविष्य में 3 मिलीयन टन की उत्पादन क्षमता वाला स्टील प्लांट लगाएगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस्पात संयंत्र लगाए जाने के लिए भूमि अधिग्रहण की स्थिति में आदिवासियों को मुआवजा, रोजगार और पुनर्वास को लेकर जब एमओयू की पड़ताल शुरु हुई तो पता चला कि एमओयू को किसी तीसरे पक्ष को सार्वजनिक नहीं करने की शर्त भी एमओयू में है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ट्राइबल वेलफेयर सोसायटी के क्षेत्रीय निदेशक प्रवीण पटेल कहते हैं- “ छत्तीसगढ़ सरकार ने असल में निजी कंपनियों को बस्तर से लौह अयस्क माटी के मोल देने के लिए बस्तर में इस्पात संयंत्र लगाने का ढोंग किया. टाटा की दिलचस्पी केवल आयरन ओर में है और वह इन पर कब्जा चाहती है. सरकार ने इसी कुचक्र के कारण एमओयू जैसे सार्वजनिक दस्तावेज को भी गोपनीय बना दिया. ”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्री पटेल के अनुसार एमओयू में सरकार ने टाटा स्टील को 99 सालों तक बस्तर से आयरन ओर निकाल कर बाहर बेचने की अनुमति दे रखी है. इसलिए इस्पात संयंत्र लगाना या न लगाना कोई मायने नहीं रखता. असली मुद्दा आयरन ओर है, जिसकी दुनिया भर में कमी है और टाटा, एस्सार, मित्तल जैसी कंपनियों की नजर बस्तर के विशाल आयरन ओर खदान की तरफ लगी हुई है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एमओयू में क्या-क्या शर्तें शामिल थीं, इसे टाटा और छत्तीसगढ़ की सरकार ही जानती है लेकिन सार्वजनिक तौर पर जो बात सामने आई, उसके अनुसार जनता की परवाह किए बिना टाटा को पानी देने, बिजली देने और आदिवासियों को रोजगार देने की बाध्यता नहीं होने की बात एमओयू में कही गई थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल टाटा ने अपने लिए 5 हज़ार एकड़ से अधिक भूमि अधिग्रहण के लिए बस्तर के लोहण्डीगुड़ा इलाके के 10 गांवों का चयन किया. लेकिन पहले दौर में ही आदिवासियों ने अपनी खेती की जमीन देने से इंकार कर दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद शुरु हुआ पंचायत कानून के नाम पर पेशा का खेल और सरकार ने साम-दाम-दंड-भेद का इस्तेमाल करते हुए आदिवासियों की जमीन अधिग्रहण करने की कोशिश की. लेकिन आदिवासी सरकार से दो-दो हाथ करने के लिए सामने आ गये. टाकरागुड़ा, कुम्हली, बड़ांजी, बेलर, सिरिसगुड़ा, बड़ेपरौदा, दाबपाल, धूरागांव, बेलियापाल और छिंदगांव के ग्रामीण अपनी 2161 हेक्टेयर कृषि भूमि को किसी भी कीमत पर टाटा को देने के लिए राजी नहीं थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरपंचों की अनुपस्थिति में ग्राम सभाएं हुईं, आदिवासियों के इन गांवों को पुलिस छावनी में बदल दिया गया, विरोध करने वालों को जेल भेजा गया. कुछ लोगों को मुआवजा का चेक भी दिया गया. लेकिन कई-कई बार यह सारी प्रक्रिया दुहराने के बाद भी ग्रामीण नहीं माने. और आज भी मामला जहां का तहां है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रभावित गांव कुम्हली के बल्देव सिंह कहते हैं- “टाटा का संयंत्र हमारी लाश पर ही बनेगा.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस इलाके में ग्रामीणों के साथ आंदोलन करने वाले भाकपा के एक नेता कहते हैं- “टाटा अगर यहां से जाना चाहती है तो यह खुशी की बात है लेकिन इससे टाटा को कोई नुकसान नहीं होगा. उसे तो आयरन ओर ही चाहिए और वह तो उसे छत्तीसगढ़ सरकार किसी भी कीमत पर देगी.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मतलब ये कि टाटा के दोनों हाथ में आयरन ओर हैं और आने-जाने के खेल में बस नफा ही नफा है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4899887448875290989-159055128550691362?l=chhattisgarhdaily.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='related' href='http://raviwar.com/news/112_after-singur-now-bastar-tata.shtml' title='सिंगूर के बाद अब बस्तर को टाटा ?'/><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chhattisgarhdaily.blogspot.com/feeds/159055128550691362/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4899887448875290989&amp;postID=159055128550691362' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4899887448875290989/posts/default/159055128550691362'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4899887448875290989/posts/default/159055128550691362'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chhattisgarhdaily.blogspot.com/2009/01/blog-post.html' title='सिंगूर के बाद अब बस्तर को टाटा ?'/><author><name>Vandana</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4899887448875290989.post-1681133563074465748</id><published>2008-11-29T14:16:00.003+05:30</published><updated>2008-11-29T15:02:16.578+05:30</updated><title type='text'>मेरी गिरफ्तारी लोकतंत्र की असफलता है-अजय टी जी</title><content type='html'>&lt;span style="color: rgb(102, 102, 102);"&gt;साभार - &lt;a href="http://www.raviwar.com"&gt;रविवार.कॉम&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश में सर्वाधिक नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ में माओवादी होने का आरोप लगाकर गिरफ्तार&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(102, 102, 102);"&gt;किए गए फ़िल्मकार अजय टी जी का मानना है कि उनके खिलाफ राजनीतिक इशारों पर कार्रवाई &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(102, 102, 102);"&gt;हुई है. छत्तीसगढ़ में लोक स्वातंत्र्य संगठन यानी पीयूसीएल के महासचिव विनायक सेन &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(102, 102, 102);"&gt;मानवाधिकार की आड़ में माओवादी गतिविधियां चलाने के आरोप में पहले से ही जेल में हैं. &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(102, 102, 102);"&gt;अजय टी जी पिछले कुछ सालों से विनायक सेन के साथ मानवाधिकार के मुद्दे पर काम कर रहे &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(102, 102, 102);"&gt;हैं. अजय का कहना है कि विनायक सेन के साथ काम करने के कारण उन्हें निशाना बनाया गया.&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(102, 102, 102);"&gt; पोटा और टाडा के समकक्ष माने जाने वाले छत्तीसगढ़ जनसुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(102, 102, 102);"&gt;किए गए अजय को कुछ दिन पहले ही जमानत पर रिहा किया गया है. आलोक प्रकाश पुतल ने उनसे &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(102, 102, 102);"&gt;लंबी बातचीत की. यहां पेश है, उस बातचीत के अंश.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;आलोक प्रकाश पुतुल -&lt;/span&gt; पुलिस का आरोप है कि आप नक्सली हैं, नक्सलियों के समर्थक हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;अजय टी जी -&lt;/span&gt; मैं अपनी पूरी जिंदगी में कभी भी नक्सलियों का समर्थक नहीं रहा. न कभी नक्सली रहा क्योंकि मैं कम्युनिस्ट हूं. मैं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य रहा हूं और ये बात बहुत स्पष्ट है कि भाकपा और नक्सलियों के बीच गहरे मतभेद रहे हैं. यहां तक कि नक्सलियों ने बस्तर समेत देश के कई स्थानों पर भाकपा कार्यकर्ताओं की हत्या भी की है. इसलिए ये आरोप एकदम गलत है, एकदम झूठ है. सिद्धांततः मैं किसी भी प्रकार की हत्या के खिलाफ हूं. किसी भी निर्दोष की हत्या के खिलाफ हूं. मेरे नक्सली होने के पक्ष में पुलिस के पास या किसी के भी पास कोई प्रमाण नहीं है, प्रमाण हो भी नहीं सकता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;आलोक प्रकाश पुतुल&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; -&lt;/span&gt; पुलिस का दावा है कि आपके नक्सलियों से दोस्ताना पत्र-व्यवहार रहे हैं. कुछ बड़े नक्सली नेताओं के घर से आपकी चिट्ठी भी मिली है. कहा जाता है कि बस्तर में विनायक सेन, नंदनी सुंदर और आपके द्वारा किसी दौरे के समय भूलवश स्थानीय नक्सलियों द्वारा आपका कैमरा जब्त कर लिया गया था, जिसके मुआवजे या कैमरे के लिए भी आपने किसी नक्सली नेता को कोई चिट्ठी लिखी ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(153, 0, 0);"&gt;अजय टी जी -&lt;/span&gt; ये पूरी बात भ्रामक है. मेरी जानकारी में ये बात नहीं है कि मैंने कोई चिट्ठी लिखी है. हां, मेरी जमानत के समय जरुर ये कहा गया कि मेरे द्वारा लिखी गई कोई चिट्ठी किसी नक्सली नेता के घर से बरामद हुई है लेकिन न तो उसे कोर्ट में प्रस्तुत किया गया और न ही मुझे या मेरे वकील को वह कथित चिट्ठी ही दिखाई गई. यहां तक कि मेरे खिलाफ सरकार द्वारा पेश किए गए किसी दस्तावेज़ में भी वह कथित चिट्ठी शामिल नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(153, 0, 0);"&gt;आलोक प्रकाश पुतुल -&lt;/span&gt; फिर पुलिस ने आपको निशाना क्यों बनाया ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(153, 0, 0);"&gt;अजय टी जी -&lt;/span&gt; मुझे निशाना बनाने का कारण एकदम स्पष्ट है. जो दिखता है, उससे साफ समझ में आता है&lt;br /&gt;कि पुलिस छत्तीसगढ़ में पीयूसीएल को खत्म करना चाहती थी. मैं क्योंकि पीयूसीएल के सचिव विनायक सेन के मामले में गवाह हूं और विनायक सेन के मामले में लगातार कोर्ट जाता रहा हूं, इसलिए मैं निशाने पर रहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे इतने सालों में एक बार के लिए भी, कभी ऐसा नहीं लगा कि विनायक सेन के नक्सलियों से संबंध हैं या वो नक्सली हैं. मैं स्वाभाविक रुप से उनके पास जाता था. सिर्फ और सिर्फ यही कारण है. विनायक सेन के मुकदमे में चार दिन के ट्रायल शुरु होने के ठीक दूसरे दिन मुझे गिरफ्तार कर लिया गया. ये एकदम स्पष्ट है कि मेरी गिरफ्तारी पूरी तरह से पॉलिटकली मोटिवेट हो कर की गई थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(153, 0, 0);"&gt;आलोक प्रकाश पुतुल -&lt;/span&gt; पुलिस विनायक सेन को माओवादी बताती है और आप उनके साथ काम करते रहे हैं. आपने तो विनायक सेन पर फिल्म भी बनाई हैं ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(153, 0, 0);"&gt;अजय टीजी -&lt;/span&gt; हां. मैने विनायक सेन को जैसा देखा, मैंने विनायक सेन को जितना समझा उस पर मैंने अंजाम नाम से फिल्म बनाई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(153, 0, 0);"&gt;आलोक प्रकाश पुतुल -&lt;/span&gt; आप पहले भी फिल्में बनाते रहे हैं….&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;आजय टी जी - &lt;/span&gt;मेरी फिल्में मूल रुप से समाज में, व्यवस्था में बदलाव की मांग करने वाली फिल्में हैं. मैं उसी तरह की फिल्में बनाता रहा हूं. इमेजेज इन सोशल चेंजेस. समाजशास्त्र से संबंधित फिल्में बनाता रहा हूं, जिसमें मेरी गहरी दिलचस्पी है. कुछ फिल्में मैंने ताज़ा संदर्भों पर भी बनाई हैं. ताजा मामला एक फैक्ट फाइंडिंग फिल्म का था- जिरमतराई. इस फिल्म कम रिपोर्ट में यह दिखाया गया था कि पुलिस ने नक्सल प्रभावित बस्तर में किस तरह तीन किसानों को गोली मार दी और नक्सलियों पर उनकी हत्या का आरोप लगा दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह एक फिल्म का मैंने संपादन किया, जो बस्तर के गोलापल्ली में पुलिस के फर्जी मुठभेड़ पर है. पुलिस ने तीन शिक्षक और एक विद्यार्थी समेत चार लोगों को गोली मार दी. बाद में एक शिक्षक जिंदा बच गया और उसने यह राज खोला कि उन्हें पुलिस ने गोली मारी थी. इसके अलावा छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में एक महिला लेधा के पति को नक्सली होने के आरोप में फर्जी मुठभेड़ में मार डालने और बाद में उस महिला के साथ पुलिस द्वारा किए गए अत्याचार को मैंने दर्ज किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राज्य और देश में मानवाधिकार के हनन की घटनाओं को लेकर मैं लगातार फिल्में बनाता रहा हूं. मैं मानता हूं कि बहुत सारी महत्वपूर्ण खबरें कई-कई कारणों से मुख्यधारा की मीडिया में नहीं आ पातीं. इसके ठीक उलट कई खबरों को अनावश्यक रुप से काल्पनिक विस्तार देकर प्रकाशित-प्रसारित किया जाता है और सच इसके पीछे छुप जाता है. ऐसे में मुझे हमेशा लगता है कि कोई तो ऐसे प्रताड़ित लोगों की आवाज़ उठाने वाला हो. इनकी बात लोगों तक पहुंचाने की कोशिश होनी चाहिए. ऐसे में आप कह सकते हैं कि फिल्म मेरे लिए वैकल्पिक माध्यम की तरह है. आज तक मैंने जितनी भी फिल्में बनाई हैं, किसी दबाव या प्रलोभन में नहीं बनाई है. जो मुझे रुचता है, मैं उस विषय पर काम करता हूं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(153, 0, 0);"&gt;आलोक प्रकाश पुतुल - &lt;/span&gt;आपकी इन फ़िल्मों के लिए आय के स्रोत क्या हैं ? पुलिस का तो आरोप है कि आपको फ़िल्म निर्माण के लिए माओवादियों से मदद मिलती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(153, 0, 0);"&gt;अजय टी जी -&lt;/span&gt; मैंने आज तक कोई भी ऐसी फिल्म नहीं बनाई है, जिसमें कोई खास खर्च हुआ हो. मेरे पास जो कैमरा है, वो मुझे फ़िल्मकार मार्ग्रेट डिकिंशन ने उपहार दिया था. मैं कैमरा से लेकर संपादन तक का काम खुद करता हूं. मेरी पत्नी शोभा भी फ़िल्म संपादक हैं. मैं वही काम करता हूं, जिसे वहन कर सकूं. मेरे पास फिल्म संपादन के जो साधन हैं, वो भी मित्रों से उधार ले कर खरीदे हुए हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(153, 0, 0);"&gt;आलोक प्रकाश पुतुल -&lt;/span&gt; फ़िल्म के अलावा ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(153, 0, 0);"&gt;अजय़ टी जी &lt;/span&gt;- लंदन स्कूल ऑफ इकानामिक्स के प्रोफेसर जोनाथन पैरी के सहयोगी के बतौर मैं 1993 से सोशल एंथ्रोपोलॉजी विषयक अध्ययन में मदद कर रहा हूं. भारतीय समाज में खास तौर पर जातीय संबंधों में  औद्योगीकरण का प्रभाव किस तरह पड़ा है, मैं उन्हीं आधारभूत तत्वों को देख-परख रहा हूं. संभवतः 1-2 सालों में यह अध्ययन पूरा हो जाएगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(153, 0, 0);"&gt;आलोक प्रकाश पुतुल - &lt;/span&gt;आपके खिलाफ आरोप क्या-क्या है ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(153, 0, 0);"&gt;अजय़ टी जी - &lt;/span&gt; ये भी दिलचस्प है. मेरे खिलाफ आज तक कोई एफआईआर दर्ज नहीं है. मेरी गिरफ्तारी के वक्त या जेल भेजने से पहले भी मुझे नहीं बताया गया कि मेरे खिलाफ आरोप क्या हैं. सच तो ये है कि मैं आज तक ये बात नहीं जान पाया. मुझे विशेष जनसुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार किया गया था, ये मुझे जेल परेड में पता चली.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(153, 0, 0);"&gt;आलोक प्रकाश पुतुल -&lt;/span&gt; मानवाधिकार के जिस मुद्दे पर आप काम करते रहे हैं, क्या कभी आपको लगा था कि राज्य सरकार आपको प्रताड़ित कर सकती है या आपको नक्सली बताया जा सकता है ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(153, 0, 0);"&gt;अजय टी जी - &lt;/span&gt;मेरी गिरफ्तारी तक कभी भी मुझे नहीं लगा कि मेरे साथ कभी ऐसा कुछ हो सकता है. मैंने कभी भी किसी भी तरह के गैरकानूनी काम नहीं किए. असंवैधानिक काम करने की मैं सोच भी नहीं सकता था. ऐसे में मैं इस ओर से लापरवाह था क्योंकि मैं एक लोकतांत्रिक देश का नागरिक हूं और कभी सोचा भी नहीं कि मेरे साथ ऐसा हो सकता है. विनायक सेन या पीयूसीएल के साथ मेरे संबंध भी किसी से छुपे हुए नहीं थे और न ही ऐसा करने की मुझे कोई ज़रुरत थी. मैंने ऐसा कोई काम किया ही नहीं था कि मुझे लगे कि मुझे कानूनी रुप से डरना चाहिए. हां, विनायक सेन की गिरफ्तारी के बाद और मेरे घर पर पुलिस की छापेमारी के बाद मुझे ये तो आभास था कि पुलिस वाले चाहें तो कुछ भी कर सकते हैं. लेकिन इतने पर भी मुझे भरोसा था कि मेरे साथ कुछ भी ऐसा-वैसा नहीं होगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे कई बार हंसी आती है. मेरे पीछे पुलिस ने तहकिकात के नाम पर जाने कितने पैसे खर्च कर डाले. और ये सब तब हुआ, जब पुलिस के पास 1981-82 से मेरे बारे में तमाम जानकारियां थीं. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य बनने के साथ ही भिलाई पुलिस ने मेरी एक फाइल तैयार कर ली थी और उन्हें मेरे हरेक काम की जानकारी थी. लोकल इंटलिजेंसी के पास मुझसे संबंधित तमाम जानकारियां थीं क्योंकि फिल्मों के सिलसिले में राज्य, देश और देश से बाहर जाने और देश और दुनिया भर के लोगों के मुझसे संपर्क के कारण उनके लिए मुझसे संबंधित जानकारियां रखना जरुरी था. कई दफा तो ये मुझसे भी मेरे काम की जानकारियां लेते रहे हैं. इसके बाद भी उन्होंने राजनीति से प्रेरित हो कर मुझे नक्सली बताने की कोशिश की, मुझे जेल भेजा, छत्तीसगढ़ जनसुरक्षा कानून में मुझे सड़ाने की कोशिश की. आज पुलिस कहती है कि अजय टी जी की गिरफ्तारी टेक्नीकल मिस्टेक है. मेरे लिए यह चौंकाने वाली बात लगती है कि क्या देश की पुलिस व्यवस्था इसी तरह काम करती है. इतनी कमजोर, इतनी बेबस और इतनी लापरवाह...! मैं मानता हूं कि मेरी गिरफ्तारी राजनीति प्रेरित है और बाकी तो सब बहाना है. रही बात मानवाधिकार की तो मानवाधिकार मेरे लिए केवल पुलिस, नक्सलियों और आतंकवादियों से जुड़ा मुद्दा नहीं है. किसी बच्चे को अगर खाना नहीं मिल रहा है, उसके लिए शिक्षा की व्यवस्था नहीं हो रही है, किसी को दवा नहीं मिल रही है तो ये सब मानवाधिकार का हिस्सा है और मैं इन मुद्दों पर लगातार काम कर रहा हूं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(153, 0, 0);"&gt;आलोक प्रकाश पुतुल -&lt;/span&gt; एक लोकतांत्रिक देश में...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(153, 0, 0);"&gt;अजय टी जी -&lt;/span&gt; किस लोकतंत्र की बात कर रहे हैं ? भारत में लोकतंत्र खतरे में है. लोकतंत्र शब्द का जब आप इस्तेमाल करते हैं तो उसका एक व्यापक अर्थ है. लेकिन अगर आपकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ही खत्म कर दी जाए तो इस लोकतंत्र का भविष्य क्या होगा. छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ से बाहर भी जिस तरह के दमनकारी कानून बनाए गए हैं, उसने लोकतंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है. मेरे लिए यह विश्वास करना मुश्किल है कि भारत में लोकतंत्र है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(153, 0, 0);"&gt;आलोक प्रकाश पुतुल -&lt;/span&gt; यह लोकतंत्र ही तो है कि आपकी गिरफ्तारी और जनसुरक्षा कानून के बाद भी आपको जमानत मिलती है. आपकी जय होती है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(153, 0, 0);"&gt;अजय टी जी -&lt;/span&gt; सवाल जय-पराजय का नहीं है. एकदम स्पष्ट है कि मैं जेल में था तो यह मेरी कमजोरी नहीं थी, मेरी गलती नहीं थी. यह पूरे सिस्टम की जिम्मेवारी से जुड़ा हुआ सवाल है. एक आदमी, जो हर तरह के आतंक के खिलाफ है, उसे ऐसे कानून में जेल भेजा जाता है, जो आतंकवादियों को खत्म करने के नाम पर बनाया गया है. यह पूरे सिस्टम, पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था में आम जन की आस्था का माखौल है, यह उसका अपमान है. यह लोकतंत्र&lt;br /&gt;की असफलता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(153, 0, 0);"&gt;आलोक प्रकाश पुतुल -&lt;/span&gt; अपने जेल के दिनों को किस तरह याद करना चाहेंगे ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(153, 0, 0);"&gt;अजय टी जी -&lt;/span&gt; नक्सली होने के आरोप में मैं जैसे ही जेल गया, मेरे परिवार के साथ पड़ोसियों ने बात करना बंद कर दिया. अखबारों में पुलिस के बयान इस तरह छपते रहे कि लोगों ने मेरे घर आना-जाना बंद कर दिया. मेरी पत्नी अकेले इन सबका मुकाबला करती रही. आज भी कई लोग मुझे देखते हैं तो कन्नी काट जाते हैं. मैंने जेल में 93 दिन बिताए. दुर्ग सेंट्रल जेल में. जेल के जिस बैरक में मुझे पहले दिन रखा गया, उसकी क्षमता 40 लोगों की थी लेकिन मैं उस बैरक में दाखिल होने वाला 105वां आदमी था. बाद में मुझे 5 नंबर बैरक में शिफ्ट किया गया,&lt;br /&gt;जिसमें 20 लोगों की क्षमता थी और वहां हमेशा 55 लोग और कभी-कभी तो 65 लोगों को भी कैद करके रखा जाता था. 250 लोग एक टेप से नहाते थे, गरमी के दिन में. तो आप जेल के मेरे दिनों की कल्पना कर सकते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(153, 0, 0);"&gt;आलोक प्रकाश पुतुल -&lt;/span&gt; आपको तो नक्सलियों का थिंक टैंक, उनका मीडिया सलाहकार, उनका प्रवक्ता भी बताया गया. तो क्या जेल में आपको विशेष सुरक्षा व्यवस्था के तहत नहीं रखा जाता था?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(153, 0, 0);"&gt;अजय टी जी -&lt;/span&gt; ये बहुत दिलचस्प है. मुझे हंसी भी आती है. मुझे बैरक में हमेशा भीड़ में रखा गया. बेहद खतरनाक अपराधियों के साथ. लेकिन जब कभी मुझे कोर्ट लाया जाता था तो मुझे कोर्ट के लॉकअप में विशेष सुरक्षा के साथ अलग-थलग रखा जाता था. यानी सार्वजनिक तौर पर जब भी मुझे पेश किया गया तो मुझे खौफनाक बंदी के रुप में पेश किया गया. मुझे सबसे ज्यादा आपत्ति इस बात पर थी कि मुझे हमेशा जेल में नक्सली कैदी के रुप में प्रचारित किया गया. यहां तक कि मेरे कोर्ट वारंट में भी नक्सली अजय टी जी दर्ज होता था.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4899887448875290989-1681133563074465748?l=chhattisgarhdaily.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='related' href='http://raviwar.com/news/97_ajay-tg-interview-alok-putul.shtml' title='मेरी गिरफ्तारी लोकतंत्र की असफलता है-अजय टी जी'/><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chhattisgarhdaily.blogspot.com/feeds/1681133563074465748/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4899887448875290989&amp;postID=1681133563074465748' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4899887448875290989/posts/default/1681133563074465748'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4899887448875290989/posts/default/1681133563074465748'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chhattisgarhdaily.blogspot.com/2008/11/blog-post.html' title='मेरी गिरफ्तारी लोकतंत्र की असफलता है-अजय टी जी'/><author><name>Vandana</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4899887448875290989.post-3282770836868244839</id><published>2008-10-13T12:14:00.005+05:30</published><updated>2008-10-13T13:03:10.498+05:30</updated><title type='text'>अपने अकेलेपन से सोनाबाई का मौलिक प्रतिशोध</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;साभार :&lt;/span&gt; &lt;a href="http://raviwar.com/news/90_sonabai-chhattisgarh-shampashah.shtml"&gt;रविवार.कॉम&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(102, 102, 102);"&gt;बिरले ही सही, पर, कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके पास बैठकर आपको लगता है कि पृथ्वी सदैव अपनी धुरी पर घूमती रह सकेगी,कि धूप में गरमाहट रहेगी, कि पृथ्वी के जंगल नष्ट नहीं किये जा सकेंगे या विनोद कुमार शुक्ल की कविता की पंक्ति को लें तो लगता है-''सब कुछ होना बचा रहेगा.''&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://raviwar.com/news/images/sonabai-ee.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 171px; height: 241px;" src="http://raviwar.com/news/images/sonabai-ee.jpg" alt="" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;पुहपुटरा&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, अम्बिकापुर, छत्तीसगढ़ की सोनाबाई रजवार इन्हीं बिरले आत्मीय जनों में से एक थीं. सोनाबाई को उनके घर के ऑंगन में,उनकी अपनी ही सिरजी हुई दुनिया से घिरा बैठा देखना एक अनुभव था. वे एक साथ उसमें रमी हुई और उससे निरपेक्ष जान पड़ती थीं जैसे वे इस दुनिया में हों भी और नहीं भी. विलक्षण बात यह कि उनके चेहरे, &lt;span&gt;&lt;span&gt;उनके&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; व्यक्तित्व का वह स्थितप्रज्ञ, अपने में डूबा हुआ-सा भाव उनके काम में भी उतनी ही शिद्दत के साथ प्रतिबिम्बित होता है. उनके घर के बरामदे में बनी मिट्टी की जालियों की ओर इशारा करते हुए जब मैं बार-बार सोनाबाई से पूछती कि गोल-गोल आकारों से बनी उस जाली को क्या कहते हैं और उस ऊपर वाली जाली का नाम क्या है जिसमें चिड़िया बैठी है, तो वे कहतीं “नईं जानू मैं! जब ये झिझुंरी (जाली) बनाये रही तब क्या मालूम था कि कोई इसका नाम पूछेगा! तब तो जो मन में आता गया, बनाती गई. वैसे चाहो तो इसे चूड़ी झिंझुरी, और जिसमें चिड़िया बैठी है उसे पिंजरा झिंझुरी कह सकते हैं.” नहीं, सोनाबाई ने अपने घर में ये सुन्दर जालियाँ, ये जानवर, पक्षी, मानव आकृतियाँ इसलिये नहीं बनाई थीं कि एक दिन लोग आकर उनसे इन सबके बारे में पूछें या इस सौन्दर्य की सृष्टि के लिये उन्हें धन-मान देकर सम्मानित करें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब प्रश्न है कि सोनाबाई ने ऐसा अभूतपूर्व घर क्यों बनाया जिसके बारे में 1983 में जब पहले-पहल लोगों को पता चला तब से देश-विदेश के कला मर्मज्ञों के आने का सिलसिला आज भी जारी है &lt;span&gt;? सोनाबाई&lt;/span&gt; का सात शब्दों का सीधा-सा जवाब था- “घर सुघड़ लगेगा ऐसा सोचकर सहज बनाया.” लेकिन सोनाबाई तथा उनके इकलौते बेटे दरोगाराम के साथ उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं पर हुई अंतरंग बातचीत के दौरान वे बातें सामने आईं, जो एक कलाकार के जन्म लेने, खिलने की पूरी प्रक्रिया को सामने लाती हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सात भाई-बहनों में से एक सोनाबाई का जन्म छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के केनरापारा गाँव में कृषि प्रधान रजवार समुदाय के एक भरे-पूरे परिवार में 1930 के आसपास हुआ था. चौदह बरस की उम्र में उनका ब्याह पास के गाँव पुहपुटरा के रहने वाले होलीराम रजवार के साथ हुआ. सास पहले ही गुज़र चुकी थीं और ससुर का भी जल्दी ही देहांत हो गया. ज़मीन जायदाद का बँटवारा ऐसा हुआ कि होलीराम को बस्ती से दूर, खेतों के पास नया घर बनाना पड़ा. गृहस्थी को नये सिरे से जमाना था, लिहाज़ा होलीराम दिन भर खेत में लगे रहते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छोटी-सी सोनाबाई दिन भर करे तो क्या करें? न आस पड़ौस, न घर में कोई बोलने वाला और फिर घर भी तो अभी अधूरा था. लिपाई-रंगाई अभी बाकी थी. सिर्फ दीवारों और छत से भला घर बनता है? कम से कम सोनाबाई का घर तो इतने से निश्चित ही नहीं बनता. बचपन में सोनाबाई ने अपनी माँ को रंगाई लिपाई करते देखा था. छेरता (मकर संक्राति) के समय माँ लिपाई करतीं, तो तरह-तरह के छोहा निकालती थीं. सरगुजा के इलाके में घर एक विशिष्ट तरीके से लीपे जाते हैं. गोबर-मिट्टी की दीवार पर स्त्रियाँ छुही यानी सफेद खड़िया मिट्टी के घोल में सूती कपड़े को भिगाकर उससे दीवार का एक टुकड़ा पोतती हैं और इसके पहले कि सतह सूखे, वे फुर्ती से उस पर उँगलियों से सीधी, आड़ी, तिरछी, लहरदार लकीरें उकेरती हैं. &lt;span&gt;&lt;span&gt;इस&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; तरह छोटे-छोटे आयताकार खण्डों से मिलकर पूरे घर की लिपाई होती है जिसे छोहा लिपाई कहते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने सूने मकान और उसमें अपने अकेलेपन के इर्द-गिर्द सोनाबाई ने जीवन का ऐसा मेला रचा जिसमें तमाम ऋतुएँ, त्यौहार, जंगल, खेत-खलिहान लहलहा उठे. जब अपना घर बनाने के लिये सोनाबाई ने एक बार मिट्टी हाथ में ली तो फिर वह कभी छूटी ही नहीं. पता नहीं सोनाबाई ने मिट्टी को नहीं छोड़ा या कि मिट्टी ने सोनाबाई को नहीं छोड़ा. बहरहाल सोनाबाई बताती हैं कि उनके पति खेत से लौटते तो उनके मिट्टी सने हाथ देखकर गुस्सा करते- “जब देखो तब हाथ में चिखला (मिट्टी) धरे रहती है. इससे पेट भरेगा क्या ?!” पर इस गुस्से का सोनाबाई पर कोई असर नहीं हुआ. उनके घर से जाते ही सोनाबाई फिर से चिखला धर लेतीं और काम में जुट जातीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आंगन से कमरों को अलग करते हुए जो बरामदे थे वहाँ धीरे-धीरे एक अलग ही दुनिया आकार लेने लगी. बाँस की छोटी-छोटी पतली खपच्चियों को मोड़कर, उसे सुतली से बाँधकर और उस पर फिर मिट्टी चढ़ाकर सोनाबाई ने नाना आकारों की झिंझुरी बनाई और तब उस पर कहीं ढोल बजाते आदमी, कहीं झाँकता हुआ शरारती बच्चा, कहीं बिल्ली, शेर, गाय, चिड़िया, साँप सब एक-एक कर प्रकट होने लगे. धीरे-धीरे बरामदे से लगी कमरे की बाहरी दीवारें भी विस्तृत लैण्डस्केप में बदल गईं जिस पर कहीं पीपल की फैली डालों पर उत्पात मचाते बंदर थे, तो कहीं सींग से सींग भिड़ाकर लड़ते बैल थे. दूर क्षितिज पर एक दूल्हा अकेला ही घोड़े पर चढ़कर जा रहा था और दीवार के दूसरे छोर पर लड़के-लड़कियों का सैला नृत्य करता समूह गुज़र रहा था. दीवार पर जगह-जगह घने देथा (आलों) में कहीं बकरी शेर के साथ बैठी थी तो कहीं बंसी बजाते हुए कृष्ण विराजमान थे. सोनाबाई के हाथ जैसे रूकने का नाम ही नहीं लेते थे. यह सिलसिला कई वर्षों तक चला. घर का कोई कोना अब सूना न था, हर तरफ जीवन था. दोंदकी- वह कोठी जिसमें अगले वर्ष के लिये बीज रखा जाता है, वह भी गाय-बैलों की आरामगाह बन गई थी. अपने&lt;br /&gt;सूने मकान और उसमें अपने अकेलेपन के इर्द-गिर्द सोनाबाई ने जीवन का ऐसा मेला रचा जिसमें तमाम ऋतुएँ, त्यौहार, जंगल, खेत-खलिहान लहलहा उठे. अपने अकेलेपन से ऐसा मौलिक प्रतिशोध?&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://raviwar.com/news/images/sonabai-e.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 243px; height: 167px;" src="http://raviwar.com/news/images/sonabai-e.jpg" alt="" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;एक क्षण के लिये भ्रम होता है कि बात पारंपरिक कलाकार की नहीं बल्कि किसी आधुनिक चेतना के कलाकार की हो रही है. लेकिन जो जीवित है उसी को तो परंपरा कहेंगे और वह जीवित तभी बच सकती है जब उसकी सिंचाई नित नये विचारों, रूपाकारों से हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोनाबाई से मैंने यह प्रश्न दो साल पहले और पन्द्रह साल पहले भी पूछा था कि उन्होंने यह काम किससे सीखा? उनका जवाब यही था- “माँ से सीखा.” लेकिन इस संबंध में जो तथ्य सामने आये वो बेहद चौंकानेवाले हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1983 में भारत भवन, भोपाल की आदिवासी तथा लोककला दीर्घा के लिये संकलन करने हेतु एक दल सरगुजा के गाँवों में पहुंचा. वहाँ के लोग मुख्य रूप से मिट्टी की पकी हुई चीज़ें खोज रहे थे. तभी अम्बिकापुर गेस्ट हाउस के चौकीदार ने पुहपुअरा की सोनाबाई के घर का हवाला दिया दल, जिसमें प्रसिध्द चित्रकार, छायाकार ज्योति भट्ट भी थे, सोनाबाई के घर पहुंचा तो उनकी सिरजी दुनिया को देख दंग रह गया. चँकि सोनाबाई ने तब भी उन्हें यही बताया था कि यह काम परंपरा से होता आया है और उन्होंने अपनी माँ से सीखा था इसलिये दल के सदस्यों ने उस गाँव और आस-पास के गाँवों का हर घर छान डाला. पर वैसा काम पूरे इलाके में कहीं नहीं मिला. हाँ जिसे छोहा लिपाई कहते हैं, वह ज़रूर कई घरों में थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे अनेक लोग जो यह मानते हैं कि परंपरा तो वह है जिसमें बदलाव नहीं है, जिसमें व्यक्तिगत हस्ताक्षर की जगह नहीं है, जो ज्यों की त्यों पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती जाती है, उनके लिये यह उदाहरण विचलन पैदा करने वाला होना चाहिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1983 में सोनाबाई को दिल्ली में राष्ट्रपति सम्मान तथा 1986 में भारत भवन, भोपाल में तुलसी सम्मान मिला. देश-विदेश के लोगों का उनके घर ताँता लग गया जो आज भी जारी है. कई विदेशी दौरे भी करने पड़े. इस सब से इलाके में उनका मान-सम्मान बढ़ा और इलाके की बहुत- सी स्त्रियों ने अपने हाथ में चिखला धर अपने घरों को सजाना शुरू किया. आज इस इलाके की कई अन्य प्रतिष्ठित कलाकार भी हैं. भारत भवन के लोग जब खासा दाम देकर सोनाबाई की बनाई कुछ चीज़ें ले गये तब सोनाबाई के पति होलीराम का चकित होना लाज़मी था. उन्होंने क्या सोचा था कि उसकी हर दम चिखला में हाथ साने रहने वाली पत्नी रजवार समाज और उसके घर के लिये इतना सम्मान लायेगी. सोनाबाई को लेकिन इन तमाम सम्मान आदि से जैसे कोई लेना-देना ही नहीं था. वे कहती थीं “ घर के बाहर जैसे ही कोई गाड़ी आकर रूकती थी तो मैं छुप जाती थी, क्योंकि मुझे कहीं भी जाने से डर लगता था.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोनाबाई का पूरे इलाके में ऐसा ज़बरदस्त असर है कि किसी कला महाविद्यालय का भी क्या होता होगा.उनके अदृश्य विद्यालय से कितने ही स्नातक जिनके कारण दुनिया में ‘रजवार पेन्टिंग’, ‘रजवार क्ले रिलीफ’ का आज नाम है किंतु जाहिर है सोनाबाई को इसका श्रेय लेने में कोई दिलचस्पी नहीं थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी चार-छ: माह हुए पता चला कि सोनाबाई नहीं रही. दो वर्ष पूर्व जब मैं सरगुजा, उनके घर गई थी तो वे मुझे अपने घर के बाहर चबूतरे पर बैठी मिलीं थीं. बरसात के दिन थे, घर के बेटे-बहु बल्कि आसपास के सारे स्त्री-पुरुष खेतों में रोपा लगाने गए हुए थे. सोनाबाई, सामने फैले खेतों के विस्तार को देखती हुई चबूतरे पर प्रकृतिस्थ बैठी थीं- वैसे ही जैसे खेतों के उस पार पिल्खा पहाड़ बैठा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;लेखिका : शंपा शाह&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4899887448875290989-3282770836868244839?l=chhattisgarhdaily.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chhattisgarhdaily.blogspot.com/feeds/3282770836868244839/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4899887448875290989&amp;postID=3282770836868244839' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4899887448875290989/posts/default/3282770836868244839'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4899887448875290989/posts/default/3282770836868244839'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chhattisgarhdaily.blogspot.com/2008/10/blog-post.html' title='अपने अकेलेपन से सोनाबाई का मौलिक प्रतिशोध'/><author><name>Vandana</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4899887448875290989.post-2762546160878218948</id><published>2008-09-15T14:43:00.002+05:30</published><updated>2008-09-15T15:12:00.014+05:30</updated><title type='text'>हथियारबंद बचपन....</title><content type='html'>&lt;table style="font-family: trebuchet ms;" width="100%" border="0" cellpadding="0" cellspacing="0"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td align="left"&gt;&lt;div id="printdiv" width="100%"&gt;&lt;table width="100%" border="0" cellpadding="0" cellspacing="0"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td valign="top"&gt;&lt;table class="kreativeArticle" border="0" cellpadding="0" cellspacing="0"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td id="tAT" class="regionalText" valign="top"&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;साभार:&lt;/span&gt; &lt;a href="http://hindi.webdunia.com/news/news/regional/0809/07/1080907031_1.htm"&gt;वेबदुनिया&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमेरिका स्थित मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वाच ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट में खुलासा किया है कि छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में सरकार और माओवादी दोनों ही बच्चों का हथियारबंद संघर्ष में इस्तेमाल कर रहे हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; color: rgb(0, 0, 0);"&gt;कुल 58 पृष्ठों की इस रिपोर्ट में केंद्र सरकार का उद्देश्य छत्तीसगढ़ सरकार के अधिकारियों और जनजागरण अभियान सलवा जुडूम के तहत बनाए गए शिविरों में रहने वाले 160 लोगों के बयान हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; color: rgb(0, 0, 0);"&gt;रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के 29 राज्यों में से आधे राज्यों में माओवादी हिंसा फैल चुकी है। पिछले 20 वर्षों से जारी इस हिंसा में लगभग छह हजार लोग मारे जा चुके हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; color: rgb(0, 0, 0);"&gt;खतरनाक ड्यूटी, बच्चे और छत्तीसगढ़ का संघर्ष शीर्षक की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को हथियारबंद संघर्ष में शामिल करने से उनके घायल होने और मारे जाने का खतरा रहता है, जो अंतरराष्ट्रीय कानूनों का खुला उल्लंघन भी है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; color: rgb(0, 0, 0);"&gt;मानवाधिकार संगठन की ओर से बच्चों की वकालत करने वाले जो बेकर ने एक विज्ञप्ति में कहा है कि छत्तीसगढ़ में बच्चों को सशस्त्र संघर्ष में झोंककर सरकार और नक्सलियों द्वारा बच्चों का इस तरह शोषण करना शर्मनाक है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; color: rgb(0, 0, 0);"&gt;विज्ञप्ति के अनुसार नक्सली अपने दलों में 16 साल से कम उम्र के बच्चों की भर्ती करते हैं। सरकार समर्थित नक्सल विरोधी अभियान सलवा जुडूम में भी बच्चों का उपयोग हो रहा है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; color: rgb(0, 0, 0);"&gt;रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार ने राष्ट्रीय बाल अधिकार आयोग के समक्ष भी यह स्वीकार किया है कि कम उम्र के बच्चों को एसपीओ के पद पर भर्ती किया गया था, क्योंकि उनके पास उम्र का कोई प्रमाणपत्र नहीं था।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; color: rgb(0, 0, 0);"&gt;गौरतलब है कि वर्ष 2005 में दंतेवाड़ा और बीजापुर जिले में 3500 एसपीओ की भर्ती की गई थी, जिनमें कम उम्र के बच्चों की संख्या अधिक थी। पुलिस ने बाद में यह गलती स्वीकार करते हुए 150 बच्चों को एसपीओ के पद से हटा दिया था।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; color: rgb(0, 0, 0);"&gt;दूसरी ओर केंद्रीय गृह मंत्रालय की इस वर्ष की रिपोर्ट में सलवा जुडूम अभियान में बच्चों को शामिल किए जाने का खंडन किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि नक्सलियों ने बच्चों को जबरन अपने दल में शामिल करने की कोशिश की और उनके इनकार करने पर नक्सलियों ने बच्चों के परिजनों को प्रताड़ित किया या उनकी हत्या कर दी।&lt;/span&gt; &lt;/td&gt; &lt;/tr&gt; &lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt; &lt;/td&gt; &lt;/tr&gt; &lt;tr&gt; &lt;td valign="top"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/td&gt; &lt;/tr&gt; &lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt; &lt;/div&gt; &lt;/td&gt; &lt;/tr&gt; &lt;tr&gt; &lt;td&gt; &lt;table width="100%" border="0" cellpadding="0" cellspacing="0"&gt; &lt;tbody&gt;&lt;tr&gt; &lt;td&gt; &lt;br /&gt;&lt;/td&gt; &lt;td id="tAP"&gt; &lt;!--Paging--&gt;&lt;br /&gt;&lt;/td&gt; &lt;/tr&gt; &lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt; &lt;/td&gt; &lt;/tr&gt; &lt;tr&gt; &lt;td class="space_h"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4899887448875290989-2762546160878218948?l=chhattisgarhdaily.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chhattisgarhdaily.blogspot.com/feeds/2762546160878218948/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4899887448875290989&amp;postID=2762546160878218948' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4899887448875290989/posts/default/2762546160878218948'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4899887448875290989/posts/default/2762546160878218948'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chhattisgarhdaily.blogspot.com/2008/09/blog-post.html' title='हथियारबंद बचपन....'/><author><name>Vandana</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4899887448875290989.post-7529909747905620421</id><published>2008-08-29T09:29:00.000+05:30</published><updated>2008-08-29T09:33:53.597+05:30</updated><title type='text'>यह तो महात्मा गांधी का रास्ता नहीं</title><content type='html'>साभार : &lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;a href="http://www.raviwar.com/columnist/C17_chhattisgarh-naxal-sandeeppandey.shtml"&gt;रविवार.कॉम&lt;/a&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Verdana;"&gt;रायपुर में छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम, 2005 की वापसी तथा इस अधिनियम के  तहत गिरफ्तार तमाम निर्दोष लोगों, जैसे डॉ. विनायक सेन, अजय टीजी, साई रेड्डी, आदि,  की रिहाई हेतु आयोजित दस दिवसीय उपवास पर एक लेख के माध्यम से छत्तीसगढ़ के पुलिस  महानिदेशक एवं&lt;span lang="hi"&gt; &lt;/span&gt;साहत्यिकार विश्वरंजन ने टिप्पणी की है कि यदि  गांधी आज जीवित होते तो शायद बस्तर के जंगलों में अकेले जा कर माओवादियों से कहते  कि, 'मित्र! हिंसा छोड़ो, जो तुमसे असहमत हैं, उन्हें मारना छोड़ो, हम तुम्हें अब नहीं  मारने देंगे. तुम्हे आदिवासियों को मारने के पूर्व हमें मारना पड़ेगा. हम उफ्फ तक नहीं  करेंगे. हम हाथ तक नहीं उठाएंगे...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Verdana;"&gt;यह बात तो विश्वरंजन जी भी स्वीकार करेंगे कि राज्य की जो पुलिस व सेना के रूप में  हिंसक शक्ति है वह नक्सलवादियों या किसी भी गैर राज्य हिंसक शक्ति से बड़ी है.  विश्वरंजन जी जो बात गांधी के मुंह से गांधीवादियों के लिए कहलवाना चाहते हैं वही  बात हम विश्वरंजन जी की पुलिस व उसके द्वारा समर्थित 'सलवा जुडूम नामक गैर  संवैधानिक सशस्त्र बल के लिए कहना चाहेंगे. विश्वरंजन जी के अनुसार गांधी किसी भी  हालत में उस समूह के साथ नहीं खड़े होते जिसका बुनियादी फलसफा हिंसा और आतंक पर टिका  हुआ है. इसीलिए हम विश्वरंजन साहब को बताना चाहते हैं कि हम उनकी पुलिस, सलवा जुडूम  व उनकी सरकार के साथ नहीं खड़े हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Verdana;"&gt;इसका यह मतलब कतई नहीं है कि नक्सलवादियों द्वारा की गई हिंसा को जायज ठहराया जा  सकता है. कुल मिलाकर विश्वरंजन जी जब नक्सलवादी हिंसा की बात करते हैं तो वे यह नहीं  भुला सकते कि नक्सलवादी हिंसा असल में राज्य हिंसा के जवाब में प्रति हिंसा है. इस  राज्य हिंसा में प्रत्यक्ष हिंसा तो शामिल है ही जिसके अंतर्गत लोग पुलिस सेना व  सलवा जुडूम द्वारा की गई हिंसात्मक कार्रवाईयों के शिकार हुए हैं, लेकिन ज्यादा  महत्वपूर्ण वह अप्रत्यक्ष हिंसा है जिसके तहत एक लंबी अवधि के दौरान आम लोगों को  उनकी न्यूनतम मजदूरी, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत अनाज, मूलभूत चिकित्सा व अन्य  सुविधाओं से वंचित कर उन्हें घुट-घुट कर मरने के लिए मजबूर किया गया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Verdana;"&gt;यह शोषण व भ्रष्टाचार की व्यवस्था तो विश्वरंजन साहब नक्सलवाद से पुरानी समस्याएं  हैं और आपकी राज्य व्यवस्था ने स्थिति को ठीक करने के लिए कोई भी ठोस कदम नहीं उठाया.  बिना नक्सलवाद के मूल कारणों का विश्लेषण किए तथा नक्सलवाद के पनपने में राज्य  व्यवस्था की भूमिका की बात किए बिना नक्सलवाद को सिर्फ कोसने से कुछ काम नहीं चलेगा.  नक्सलवाद के पनपने का सीधा-सीधा मतलब है कि राज्य असफल रहा है. यदि राज्य ने अपने  सभी नागरिकों को उनकी मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु साधन उपलब्ध कराए होते तथा  उन्हें सम्मान व सुरक्षा के साथ जीने का मौका उपलब्ध कराया होता तो शायद हमें आज  नक्सलवाद की समस्या का सामना ही न करना पड़ता. नक्सलवाद की समस्या के निश्चित  सामाजिक आर्थिक-राजनीतिक कारण हैं और उसका समाधान भी सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक  क्षेत्रों में ही ढूंढ़ना होगा. नक्सलवाद की समस्या का समाधान सलवा जुडूम कतई नहीं  हो सकता. राज्य व्यवस्था को अपने चरित्र में परिवर्तन लाना पड़ेगा. उसे सिर्फ संपन्न  वर्ग, जिसमें अब ठेकेदार, कंपनियां व माफिया भी शामिल हैं, के संरक्षक की भूमिका  छोड़कर आम गरीब वंचित नागरिकों का हितैषी बनना पड़ेगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Verdana;"&gt;इस बात में तो कोई शक है ही नहीं कि गांधी कभी भी नक्सलवादियों के हिंसा व आतंक के  फलसफे का समर्थन नहीं करते लेकिन, विश्वरंजन साहब ने आज जिस शासन-प्रशासन तंत्र का  प्रतिनिधित्व कर रहे हैं उसका भी कभी समर्थन नहीं करते. गांधी की ग्राम स्वराज्य  व्यवस्था में तो हिंसा व आतंक के तरीकों का इस्तेमाल करने वाली पुलिस व सेना का कोई  स्थान हो ही नहीं सकता. वह पुलिस जो आम नागरिकों के लिए दहशत का प्रतीक है को गांधी  कभी स्वीकार करते ही नहीं. आपके थानों में जहां आम इंसान अपमानित होता है, साधारण  सी प्राथमिकी भी दर्ज नहीं होती, 'पहुंच वाले अपराधी खुले घूमते हैं तथा निर्दोष  लोगों को पकड़ कर जेलों में डाल दिया जाता है ऐसी व्यवस्था के मुखिया हैं आप यदि आज  एक संवेदनशील साहित्यकार हैं तो हम आपसे यह तो उम्मीद नहीं ही करेंगे कि आप एक  फासीवादी सरकार की सेवा करते हुए उसके फासीवादी तरीकों को जायज ठहराएंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चलिए हमारी हिम्मत नहीं है कि हम जाकर बस्तर के जंगलों में नक्सलवादियों को अहिंसा  का पाठ पढ़ा सके, लेकिन आपके पास तो पूरा तंत्र है. किसी भी गांधीवादी की संस्था से  बहुत ज्यादा साधन आपके पास हैं. नक्सलवाद से लड़ने के लिए केंद्र सरकार ने आपको  असीमित साधन उपलब्ध कराए हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप ही कुछ गांधीवादी तरीकों का प्रयोग क्यों नहीं करते? क्या आप पुलिस की व्यवस्था  को और मानवीय बना सकते हैं? क्या आप प्रदेश के पुलिस मुखिया होने के नाते ऐसा माहौल  बना सकते हैं कि आज गरीब नागरिक को पुलिस से डर न लगे और वह पुलिस को मित्र के रूप  में स्वीकार कर सके? जब आम इंसान थानों में जाए तो उसका स्वागत गालियों से न हो  बल्कि उसे सम्मानपूर्वक बैठाया जाए. क्या आपकी पुलिस लोगों को सुरक्षा प्रदान करने  के साथ अन्य सरकारी योजनाओं, जैसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली, वृध्दावस्था- विधवा  पेंशन, गरीबों के लिए आवास, भूमिहीनों के लिए पट्टे, मूलभूत शिक्षा स्वास्थ्य  सुविधाएं तथा राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का पूरा-पूरा लाभ, बिना किसी  भ्रष्टाचार के, उपलब्ध करा सकती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिलहाल तो लोगों को छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के तहत  न्यूनतम एक सौ दिनों का रोजगार नहीं मिल रहा. व्यापक स्तर पर धांधली अलग है.  राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम भी एक राष्ट्रीय कानून है. क्या इस कानून  की खुलेआम धाियां उड़ाने वाले अधिकारियों-कर्मचारियों-जनप्रतिनिधियों- ठेकेदारों के  खिलाफ आज छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम या गैर कानूनी गतिविधियां (निरोधक)  कानून के तहत कोई कार्रवाईयां कर सकते हैं? क्या पुलिस प्रभावशाली लोगों की संरक्षक  बने रहने के बजाए इस देश के आम इंसान के मौलिक एवं कानूनी अधिकारों की संरक्षक बन  सकती है? मौलिक सवाल यह है कि क्या आज इस व्यवस्था में मूलचूल परिवर्तन लाने वाले  कोई कदम उठा सकते हैं? सलवा जुडूम का प्रयोग तो कोई भी कर सकता है क्योंकि शासक  वर्ग की मानसिकता में जनता के किसी उभार को कुचलने के लिए हिंसक रास्ता ही सहज रूप  से आता है. किंतु क्या हम आप जैसे संवेदनशील अधिकारी से उम्मीद करें कि वह कोई  सृजनात्मक अहिंसक प्रयोग करेगा जिसे वार्क में गांधीवादी श्रोणी में रखा जा सके?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारी जो क्षमता है उससे हम सरकार की सभी जन विरोधी नीतियों के खिलाफ बोलते रहेंगे.  नक्सलवादियों की हिंसा का हम समर्थन नहीं करते. किंतु राज्य की ताकत व भूमिका  नक्सलवादियों से बड़ी है. राज्य से हम उम्मीद करते हैं कि वह अपनी संवैधानिक  जिम्मेदारियां ठीक से निभाएगा. हमारा मानना है कि राज्य ही नक्सलवाद की समस्या के  उभरने के लिए जिम्मेदार है तथा वही अपनी नीतियों में परिवर्तन कर इस समस्या पर काबू  भी पा सकता है. हमारे लिए छत्तीसगढ़ विशेष जनसुरक्षा अधिनियम व गैर कानूनी गतिविधियां  (निरोधक) अधिनियम के खिलाफ संघर्ष लोकतंत्र को बचाने संघर्ष है. समस्या पेचीदी है  तथा समाधान भी आसान नहीं है यह आप भी जानते हैं. अत: नक्सलवाद की समस्या पर बहस को  सिर्फ हिंसा-अहिंसा के पक्ष या विरोध में बहस तक सीमित न करें. अच्छा होगा यदि आप  अपने कौशल का प्रयोग नक्सलवाद की समस्या के मानवीय समाज में लगाएं. जब तक आपके तरीके  नहीं बदलते तब तक हम आपकी सरकार के खिलाफ बोलते रहेंगे तथा उपवास जैसे कार्यक्रमों  का भी आयोजन करेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपको याद है न गांधी ने क्या कहा था स्वराज्य के बारे में. स्वराज्य का मतलब सिर्फ  कुछ लोगों द्वारा सत्ता प्राप्त कर लेना नहीं बल्कि बहुसंख्यक जनता के अंदर यह शक्ति  पैदा होना है कि वह कुछ लोगों द्वारा सत्ता के दुरुपयोग का प्रतिकार कर सके. सलवा  जुडूम सत्ता का दुरुपयोग है. लोगों के हाथ में हथियार देना कोई बुध्दिमानी पूर्ण  कार्रवाई नहीं कही जाएगी. क्या हम इतिहास से यह सबक नहीं सीखेंगे कि जब भी गैर  राज्य शक्तियों को हथियारों से लैस किया गया है वह कुछ समय के बाद अनियंत्रित हो  जाती है तथा समाज के लिए घातक हो जाती हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर सलवा जुडूम के माध्यम से लोगों को गांव छोड़कर शिविरों में रहने के लिए क्यों  मजबूर किया जा रहा है? लोगों को उनके गांवों, खेतों, जंगलों से उजाड़कर उन्हें अपनी  आजीविका के लिए भी मोहताज बनाकर हम उन्हें कैसी सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं?  छत्तीसगढ़ प्राकृतिक संसाधनों में धनी है. फिर भी विडम्बना यह है कि लोग गरीब एवं  लाचार.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांधी के ग्राम स्वराज्य विचार के मुताबिक तो गांवों को ही सिर्फ यह अधिकार है कि  वे अपनी व्यवस्था कैसे बनाएं. गांवों में प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन कैसे होगा,  गांव में शिक्षा स्वास्थ्य सुरक्षा की व्यवस्था कैसी होगी यह तय करने का अधिकार  स्थानीय लोगों को ही है. किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि छत्तीसगढ़ सरकार अपने  प्राकृतिक संसाधनों पर से स्थानीय लोगों का अधिकार समाप्त कर पूंजीपतियों के मुनाफा  कमाने के लिए उन्हें इन संसाधनों के खुले दोहन की छूट देना चाहते है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या आप इस तथाकथित विकास के समर्थक हैं विश्वरंजन जी? यह विकास तो गांधी के विचारों  के अनुकूल है नहीं. यदि आप नक्सलवादियों को नहीं समझा सकते तो कम से कम उन  पूंजीपतियों को ही समझा दे कि जनता के प्राकृतिक संसाधनों से अपनी गिध्द दृष्टि हटा  ले. यदि आप ये भी नहीं कर सकते तो गांधी के प्रिय विषय मद्यनिषेध पर तो कुछ पहल ले  ही सकते हैं. क्या आप सरकार द्वारा शराब को बढ़ावा देने के कार्यक्रम जिससे फायदा  सिर्फ शराब माफियों का हो रहा तथा आम इंसान का परिवार बरबाद हो रहा को रोकने के लिए  कुछ कदम उठा सकते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेखक - &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(102, 102, 102); font-weight: bold;"&gt;संदीप पांडे&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Verdana;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4899887448875290989-7529909747905620421?l=chhattisgarhdaily.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chhattisgarhdaily.blogspot.com/feeds/7529909747905620421/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4899887448875290989&amp;postID=7529909747905620421' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4899887448875290989/posts/default/7529909747905620421'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4899887448875290989/posts/default/7529909747905620421'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chhattisgarhdaily.blogspot.com/2008/08/blog-post.html' title='यह तो महात्मा गांधी का रास्ता नहीं'/><author><name>Vandana</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry></feed>
