Saturday, November 29, 2008

मेरी गिरफ्तारी लोकतंत्र की असफलता है-अजय टी जी

साभार - रविवार.कॉम

देश में सर्वाधिक नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ में माओवादी होने का आरोप लगाकर गिरफ्तार
किए गए फ़िल्मकार अजय टी जी का मानना है कि उनके खिलाफ राजनीतिक इशारों पर कार्रवाई हुई है. छत्तीसगढ़ में लोक स्वातंत्र्य संगठन यानी पीयूसीएल के महासचिव विनायक सेन मानवाधिकार की आड़ में माओवादी गतिविधियां चलाने के आरोप में पहले से ही जेल में हैं. अजय टी जी पिछले कुछ सालों से विनायक सेन के साथ मानवाधिकार के मुद्दे पर काम कर रहे हैं. अजय का कहना है कि विनायक सेन के साथ काम करने के कारण उन्हें निशाना बनाया गया. पोटा और टाडा के समकक्ष माने जाने वाले छत्तीसगढ़ जनसुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार किए गए अजय को कुछ दिन पहले ही जमानत पर रिहा किया गया है. आलोक प्रकाश पुतल ने उनसे लंबी बातचीत की. यहां पेश है, उस बातचीत के अंश.

आलोक प्रकाश पुतुल - पुलिस का आरोप है कि आप नक्सली हैं, नक्सलियों के समर्थक हैं.

अजय टी जी - मैं अपनी पूरी जिंदगी में कभी भी नक्सलियों का समर्थक नहीं रहा. न कभी नक्सली रहा क्योंकि मैं कम्युनिस्ट हूं. मैं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य रहा हूं और ये बात बहुत स्पष्ट है कि भाकपा और नक्सलियों के बीच गहरे मतभेद रहे हैं. यहां तक कि नक्सलियों ने बस्तर समेत देश के कई स्थानों पर भाकपा कार्यकर्ताओं की हत्या भी की है. इसलिए ये आरोप एकदम गलत है, एकदम झूठ है. सिद्धांततः मैं किसी भी प्रकार की हत्या के खिलाफ हूं. किसी भी निर्दोष की हत्या के खिलाफ हूं. मेरे नक्सली होने के पक्ष में पुलिस के पास या किसी के भी पास कोई प्रमाण नहीं है, प्रमाण हो भी नहीं सकता.

आलोक प्रकाश पुतुल - पुलिस का दावा है कि आपके नक्सलियों से दोस्ताना पत्र-व्यवहार रहे हैं. कुछ बड़े नक्सली नेताओं के घर से आपकी चिट्ठी भी मिली है. कहा जाता है कि बस्तर में विनायक सेन, नंदनी सुंदर और आपके द्वारा किसी दौरे के समय भूलवश स्थानीय नक्सलियों द्वारा आपका कैमरा जब्त कर लिया गया था, जिसके मुआवजे या कैमरे के लिए भी आपने किसी नक्सली नेता को कोई चिट्ठी लिखी ?

अजय टी जी - ये पूरी बात भ्रामक है. मेरी जानकारी में ये बात नहीं है कि मैंने कोई चिट्ठी लिखी है. हां, मेरी जमानत के समय जरुर ये कहा गया कि मेरे द्वारा लिखी गई कोई चिट्ठी किसी नक्सली नेता के घर से बरामद हुई है लेकिन न तो उसे कोर्ट में प्रस्तुत किया गया और न ही मुझे या मेरे वकील को वह कथित चिट्ठी ही दिखाई गई. यहां तक कि मेरे खिलाफ सरकार द्वारा पेश किए गए किसी दस्तावेज़ में भी वह कथित चिट्ठी शामिल नहीं है.

आलोक प्रकाश पुतुल - फिर पुलिस ने आपको निशाना क्यों बनाया ?

अजय टी जी - मुझे निशाना बनाने का कारण एकदम स्पष्ट है. जो दिखता है, उससे साफ समझ में आता है
कि पुलिस छत्तीसगढ़ में पीयूसीएल को खत्म करना चाहती थी. मैं क्योंकि पीयूसीएल के सचिव विनायक सेन के मामले में गवाह हूं और विनायक सेन के मामले में लगातार कोर्ट जाता रहा हूं, इसलिए मैं निशाने पर रहा.

मुझे इतने सालों में एक बार के लिए भी, कभी ऐसा नहीं लगा कि विनायक सेन के नक्सलियों से संबंध हैं या वो नक्सली हैं. मैं स्वाभाविक रुप से उनके पास जाता था. सिर्फ और सिर्फ यही कारण है. विनायक सेन के मुकदमे में चार दिन के ट्रायल शुरु होने के ठीक दूसरे दिन मुझे गिरफ्तार कर लिया गया. ये एकदम स्पष्ट है कि मेरी गिरफ्तारी पूरी तरह से पॉलिटकली मोटिवेट हो कर की गई थी.

आलोक प्रकाश पुतुल - पुलिस विनायक सेन को माओवादी बताती है और आप उनके साथ काम करते रहे हैं. आपने तो विनायक सेन पर फिल्म भी बनाई हैं ?

अजय टीजी - हां. मैने विनायक सेन को जैसा देखा, मैंने विनायक सेन को जितना समझा उस पर मैंने अंजाम नाम से फिल्म बनाई.

आलोक प्रकाश पुतुल - आप पहले भी फिल्में बनाते रहे हैं….

आजय टी जी - मेरी फिल्में मूल रुप से समाज में, व्यवस्था में बदलाव की मांग करने वाली फिल्में हैं. मैं उसी तरह की फिल्में बनाता रहा हूं. इमेजेज इन सोशल चेंजेस. समाजशास्त्र से संबंधित फिल्में बनाता रहा हूं, जिसमें मेरी गहरी दिलचस्पी है. कुछ फिल्में मैंने ताज़ा संदर्भों पर भी बनाई हैं. ताजा मामला एक फैक्ट फाइंडिंग फिल्म का था- जिरमतराई. इस फिल्म कम रिपोर्ट में यह दिखाया गया था कि पुलिस ने नक्सल प्रभावित बस्तर में किस तरह तीन किसानों को गोली मार दी और नक्सलियों पर उनकी हत्या का आरोप लगा दिया.

इसी तरह एक फिल्म का मैंने संपादन किया, जो बस्तर के गोलापल्ली में पुलिस के फर्जी मुठभेड़ पर है. पुलिस ने तीन शिक्षक और एक विद्यार्थी समेत चार लोगों को गोली मार दी. बाद में एक शिक्षक जिंदा बच गया और उसने यह राज खोला कि उन्हें पुलिस ने गोली मारी थी. इसके अलावा छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में एक महिला लेधा के पति को नक्सली होने के आरोप में फर्जी मुठभेड़ में मार डालने और बाद में उस महिला के साथ पुलिस द्वारा किए गए अत्याचार को मैंने दर्ज किया.

राज्य और देश में मानवाधिकार के हनन की घटनाओं को लेकर मैं लगातार फिल्में बनाता रहा हूं. मैं मानता हूं कि बहुत सारी महत्वपूर्ण खबरें कई-कई कारणों से मुख्यधारा की मीडिया में नहीं आ पातीं. इसके ठीक उलट कई खबरों को अनावश्यक रुप से काल्पनिक विस्तार देकर प्रकाशित-प्रसारित किया जाता है और सच इसके पीछे छुप जाता है. ऐसे में मुझे हमेशा लगता है कि कोई तो ऐसे प्रताड़ित लोगों की आवाज़ उठाने वाला हो. इनकी बात लोगों तक पहुंचाने की कोशिश होनी चाहिए. ऐसे में आप कह सकते हैं कि फिल्म मेरे लिए वैकल्पिक माध्यम की तरह है. आज तक मैंने जितनी भी फिल्में बनाई हैं, किसी दबाव या प्रलोभन में नहीं बनाई है. जो मुझे रुचता है, मैं उस विषय पर काम करता हूं.

आलोक प्रकाश पुतुल - आपकी इन फ़िल्मों के लिए आय के स्रोत क्या हैं ? पुलिस का तो आरोप है कि आपको फ़िल्म निर्माण के लिए माओवादियों से मदद मिलती है.

अजय टी जी - मैंने आज तक कोई भी ऐसी फिल्म नहीं बनाई है, जिसमें कोई खास खर्च हुआ हो. मेरे पास जो कैमरा है, वो मुझे फ़िल्मकार मार्ग्रेट डिकिंशन ने उपहार दिया था. मैं कैमरा से लेकर संपादन तक का काम खुद करता हूं. मेरी पत्नी शोभा भी फ़िल्म संपादक हैं. मैं वही काम करता हूं, जिसे वहन कर सकूं. मेरे पास फिल्म संपादन के जो साधन हैं, वो भी मित्रों से उधार ले कर खरीदे हुए हैं.

आलोक प्रकाश पुतुल - फ़िल्म के अलावा ?

अजय़ टी जी - लंदन स्कूल ऑफ इकानामिक्स के प्रोफेसर जोनाथन पैरी के सहयोगी के बतौर मैं 1993 से सोशल एंथ्रोपोलॉजी विषयक अध्ययन में मदद कर रहा हूं. भारतीय समाज में खास तौर पर जातीय संबंधों में औद्योगीकरण का प्रभाव किस तरह पड़ा है, मैं उन्हीं आधारभूत तत्वों को देख-परख रहा हूं. संभवतः 1-2 सालों में यह अध्ययन पूरा हो जाएगा.

आलोक प्रकाश पुतुल - आपके खिलाफ आरोप क्या-क्या है ?

अजय़ टी जी - ये भी दिलचस्प है. मेरे खिलाफ आज तक कोई एफआईआर दर्ज नहीं है. मेरी गिरफ्तारी के वक्त या जेल भेजने से पहले भी मुझे नहीं बताया गया कि मेरे खिलाफ आरोप क्या हैं. सच तो ये है कि मैं आज तक ये बात नहीं जान पाया. मुझे विशेष जनसुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार किया गया था, ये मुझे जेल परेड में पता चली.

आलोक प्रकाश पुतुल - मानवाधिकार के जिस मुद्दे पर आप काम करते रहे हैं, क्या कभी आपको लगा था कि राज्य सरकार आपको प्रताड़ित कर सकती है या आपको नक्सली बताया जा सकता है ?

अजय टी जी - मेरी गिरफ्तारी तक कभी भी मुझे नहीं लगा कि मेरे साथ कभी ऐसा कुछ हो सकता है. मैंने कभी भी किसी भी तरह के गैरकानूनी काम नहीं किए. असंवैधानिक काम करने की मैं सोच भी नहीं सकता था. ऐसे में मैं इस ओर से लापरवाह था क्योंकि मैं एक लोकतांत्रिक देश का नागरिक हूं और कभी सोचा भी नहीं कि मेरे साथ ऐसा हो सकता है. विनायक सेन या पीयूसीएल के साथ मेरे संबंध भी किसी से छुपे हुए नहीं थे और न ही ऐसा करने की मुझे कोई ज़रुरत थी. मैंने ऐसा कोई काम किया ही नहीं था कि मुझे लगे कि मुझे कानूनी रुप से डरना चाहिए. हां, विनायक सेन की गिरफ्तारी के बाद और मेरे घर पर पुलिस की छापेमारी के बाद मुझे ये तो आभास था कि पुलिस वाले चाहें तो कुछ भी कर सकते हैं. लेकिन इतने पर भी मुझे भरोसा था कि मेरे साथ कुछ भी ऐसा-वैसा नहीं होगा.

मुझे कई बार हंसी आती है. मेरे पीछे पुलिस ने तहकिकात के नाम पर जाने कितने पैसे खर्च कर डाले. और ये सब तब हुआ, जब पुलिस के पास 1981-82 से मेरे बारे में तमाम जानकारियां थीं. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य बनने के साथ ही भिलाई पुलिस ने मेरी एक फाइल तैयार कर ली थी और उन्हें मेरे हरेक काम की जानकारी थी. लोकल इंटलिजेंसी के पास मुझसे संबंधित तमाम जानकारियां थीं क्योंकि फिल्मों के सिलसिले में राज्य, देश और देश से बाहर जाने और देश और दुनिया भर के लोगों के मुझसे संपर्क के कारण उनके लिए मुझसे संबंधित जानकारियां रखना जरुरी था. कई दफा तो ये मुझसे भी मेरे काम की जानकारियां लेते रहे हैं. इसके बाद भी उन्होंने राजनीति से प्रेरित हो कर मुझे नक्सली बताने की कोशिश की, मुझे जेल भेजा, छत्तीसगढ़ जनसुरक्षा कानून में मुझे सड़ाने की कोशिश की. आज पुलिस कहती है कि अजय टी जी की गिरफ्तारी टेक्नीकल मिस्टेक है. मेरे लिए यह चौंकाने वाली बात लगती है कि क्या देश की पुलिस व्यवस्था इसी तरह काम करती है. इतनी कमजोर, इतनी बेबस और इतनी लापरवाह...! मैं मानता हूं कि मेरी गिरफ्तारी राजनीति प्रेरित है और बाकी तो सब बहाना है. रही बात मानवाधिकार की तो मानवाधिकार मेरे लिए केवल पुलिस, नक्सलियों और आतंकवादियों से जुड़ा मुद्दा नहीं है. किसी बच्चे को अगर खाना नहीं मिल रहा है, उसके लिए शिक्षा की व्यवस्था नहीं हो रही है, किसी को दवा नहीं मिल रही है तो ये सब मानवाधिकार का हिस्सा है और मैं इन मुद्दों पर लगातार काम कर रहा हूं.

आलोक प्रकाश पुतुल - एक लोकतांत्रिक देश में...

अजय टी जी - किस लोकतंत्र की बात कर रहे हैं ? भारत में लोकतंत्र खतरे में है. लोकतंत्र शब्द का जब आप इस्तेमाल करते हैं तो उसका एक व्यापक अर्थ है. लेकिन अगर आपकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ही खत्म कर दी जाए तो इस लोकतंत्र का भविष्य क्या होगा. छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ से बाहर भी जिस तरह के दमनकारी कानून बनाए गए हैं, उसने लोकतंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है. मेरे लिए यह विश्वास करना मुश्किल है कि भारत में लोकतंत्र है.

आलोक प्रकाश पुतुल - यह लोकतंत्र ही तो है कि आपकी गिरफ्तारी और जनसुरक्षा कानून के बाद भी आपको जमानत मिलती है. आपकी जय होती है...

अजय टी जी - सवाल जय-पराजय का नहीं है. एकदम स्पष्ट है कि मैं जेल में था तो यह मेरी कमजोरी नहीं थी, मेरी गलती नहीं थी. यह पूरे सिस्टम की जिम्मेवारी से जुड़ा हुआ सवाल है. एक आदमी, जो हर तरह के आतंक के खिलाफ है, उसे ऐसे कानून में जेल भेजा जाता है, जो आतंकवादियों को खत्म करने के नाम पर बनाया गया है. यह पूरे सिस्टम, पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था में आम जन की आस्था का माखौल है, यह उसका अपमान है. यह लोकतंत्र
की असफलता है.

आलोक प्रकाश पुतुल - अपने जेल के दिनों को किस तरह याद करना चाहेंगे ?

अजय टी जी - नक्सली होने के आरोप में मैं जैसे ही जेल गया, मेरे परिवार के साथ पड़ोसियों ने बात करना बंद कर दिया. अखबारों में पुलिस के बयान इस तरह छपते रहे कि लोगों ने मेरे घर आना-जाना बंद कर दिया. मेरी पत्नी अकेले इन सबका मुकाबला करती रही. आज भी कई लोग मुझे देखते हैं तो कन्नी काट जाते हैं. मैंने जेल में 93 दिन बिताए. दुर्ग सेंट्रल जेल में. जेल के जिस बैरक में मुझे पहले दिन रखा गया, उसकी क्षमता 40 लोगों की थी लेकिन मैं उस बैरक में दाखिल होने वाला 105वां आदमी था. बाद में मुझे 5 नंबर बैरक में शिफ्ट किया गया,
जिसमें 20 लोगों की क्षमता थी और वहां हमेशा 55 लोग और कभी-कभी तो 65 लोगों को भी कैद करके रखा जाता था. 250 लोग एक टेप से नहाते थे, गरमी के दिन में. तो आप जेल के मेरे दिनों की कल्पना कर सकते हैं.

आलोक प्रकाश पुतुल - आपको तो नक्सलियों का थिंक टैंक, उनका मीडिया सलाहकार, उनका प्रवक्ता भी बताया गया. तो क्या जेल में आपको विशेष सुरक्षा व्यवस्था के तहत नहीं रखा जाता था?

अजय टी जी - ये बहुत दिलचस्प है. मुझे हंसी भी आती है. मुझे बैरक में हमेशा भीड़ में रखा गया. बेहद खतरनाक अपराधियों के साथ. लेकिन जब कभी मुझे कोर्ट लाया जाता था तो मुझे कोर्ट के लॉकअप में विशेष सुरक्षा के साथ अलग-थलग रखा जाता था. यानी सार्वजनिक तौर पर जब भी मुझे पेश किया गया तो मुझे खौफनाक बंदी के रुप में पेश किया गया. मुझे सबसे ज्यादा आपत्ति इस बात पर थी कि मुझे हमेशा जेल में नक्सली कैदी के रुप में प्रचारित किया गया. यहां तक कि मेरे कोर्ट वारंट में भी नक्सली अजय टी जी दर्ज होता था.

Monday, October 13, 2008

अपने अकेलेपन से सोनाबाई का मौलिक प्रतिशोध

साभार : रविवार.कॉम

बिरले ही सही, पर, कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके पास बैठकर आपको लगता है कि पृथ्वी सदैव अपनी धुरी पर घूमती रह सकेगी,कि धूप में गरमाहट रहेगी, कि पृथ्वी के जंगल नष्ट नहीं किये जा सकेंगे या विनोद कुमार शुक्ल की कविता की पंक्ति को लें तो लगता है-''सब कुछ होना बचा रहेगा.''

पुहपुटरा, अम्बिकापुर, छत्तीसगढ़ की सोनाबाई रजवार इन्हीं बिरले आत्मीय जनों में से एक थीं. सोनाबाई को उनके घर के ऑंगन में,उनकी अपनी ही सिरजी हुई दुनिया से घिरा बैठा देखना एक अनुभव था. वे एक साथ उसमें रमी हुई और उससे निरपेक्ष जान पड़ती थीं जैसे वे इस दुनिया में हों भी और नहीं भी. विलक्षण बात यह कि उनके चेहरे, उनके व्यक्तित्व का वह स्थितप्रज्ञ, अपने में डूबा हुआ-सा भाव उनके काम में भी उतनी ही शिद्दत के साथ प्रतिबिम्बित होता है. उनके घर के बरामदे में बनी मिट्टी की जालियों की ओर इशारा करते हुए जब मैं बार-बार सोनाबाई से पूछती कि गोल-गोल आकारों से बनी उस जाली को क्या कहते हैं और उस ऊपर वाली जाली का नाम क्या है जिसमें चिड़िया बैठी है, तो वे कहतीं “नईं जानू मैं! जब ये झिझुंरी (जाली) बनाये रही तब क्या मालूम था कि कोई इसका नाम पूछेगा! तब तो जो मन में आता गया, बनाती गई. वैसे चाहो तो इसे चूड़ी झिंझुरी, और जिसमें चिड़िया बैठी है उसे पिंजरा झिंझुरी कह सकते हैं.” नहीं, सोनाबाई ने अपने घर में ये सुन्दर जालियाँ, ये जानवर, पक्षी, मानव आकृतियाँ इसलिये नहीं बनाई थीं कि एक दिन लोग आकर उनसे इन सबके बारे में पूछें या इस सौन्दर्य की सृष्टि के लिये उन्हें धन-मान देकर सम्मानित करें.

तब प्रश्न है कि सोनाबाई ने ऐसा अभूतपूर्व घर क्यों बनाया जिसके बारे में 1983 में जब पहले-पहल लोगों को पता चला तब से देश-विदेश के कला मर्मज्ञों के आने का सिलसिला आज भी जारी है ? सोनाबाई का सात शब्दों का सीधा-सा जवाब था- “घर सुघड़ लगेगा ऐसा सोचकर सहज बनाया.” लेकिन सोनाबाई तथा उनके इकलौते बेटे दरोगाराम के साथ उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं पर हुई अंतरंग बातचीत के दौरान वे बातें सामने आईं, जो एक कलाकार के जन्म लेने, खिलने की पूरी प्रक्रिया को सामने लाती हैं.

सात भाई-बहनों में से एक सोनाबाई का जन्म छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के केनरापारा गाँव में कृषि प्रधान रजवार समुदाय के एक भरे-पूरे परिवार में 1930 के आसपास हुआ था. चौदह बरस की उम्र में उनका ब्याह पास के गाँव पुहपुटरा के रहने वाले होलीराम रजवार के साथ हुआ. सास पहले ही गुज़र चुकी थीं और ससुर का भी जल्दी ही देहांत हो गया. ज़मीन जायदाद का बँटवारा ऐसा हुआ कि होलीराम को बस्ती से दूर, खेतों के पास नया घर बनाना पड़ा. गृहस्थी को नये सिरे से जमाना था, लिहाज़ा होलीराम दिन भर खेत में लगे रहते.

छोटी-सी सोनाबाई दिन भर करे तो क्या करें? न आस पड़ौस, न घर में कोई बोलने वाला और फिर घर भी तो अभी अधूरा था. लिपाई-रंगाई अभी बाकी थी. सिर्फ दीवारों और छत से भला घर बनता है? कम से कम सोनाबाई का घर तो इतने से निश्चित ही नहीं बनता. बचपन में सोनाबाई ने अपनी माँ को रंगाई लिपाई करते देखा था. छेरता (मकर संक्राति) के समय माँ लिपाई करतीं, तो तरह-तरह के छोहा निकालती थीं. सरगुजा के इलाके में घर एक विशिष्ट तरीके से लीपे जाते हैं. गोबर-मिट्टी की दीवार पर स्त्रियाँ छुही यानी सफेद खड़िया मिट्टी के घोल में सूती कपड़े को भिगाकर उससे दीवार का एक टुकड़ा पोतती हैं और इसके पहले कि सतह सूखे, वे फुर्ती से उस पर उँगलियों से सीधी, आड़ी, तिरछी, लहरदार लकीरें उकेरती हैं. इस तरह छोटे-छोटे आयताकार खण्डों से मिलकर पूरे घर की लिपाई होती है जिसे छोहा लिपाई कहते हैं.

अपने सूने मकान और उसमें अपने अकेलेपन के इर्द-गिर्द सोनाबाई ने जीवन का ऐसा मेला रचा जिसमें तमाम ऋतुएँ, त्यौहार, जंगल, खेत-खलिहान लहलहा उठे. जब अपना घर बनाने के लिये सोनाबाई ने एक बार मिट्टी हाथ में ली तो फिर वह कभी छूटी ही नहीं. पता नहीं सोनाबाई ने मिट्टी को नहीं छोड़ा या कि मिट्टी ने सोनाबाई को नहीं छोड़ा. बहरहाल सोनाबाई बताती हैं कि उनके पति खेत से लौटते तो उनके मिट्टी सने हाथ देखकर गुस्सा करते- “जब देखो तब हाथ में चिखला (मिट्टी) धरे रहती है. इससे पेट भरेगा क्या ?!” पर इस गुस्से का सोनाबाई पर कोई असर नहीं हुआ. उनके घर से जाते ही सोनाबाई फिर से चिखला धर लेतीं और काम में जुट जातीं.

आंगन से कमरों को अलग करते हुए जो बरामदे थे वहाँ धीरे-धीरे एक अलग ही दुनिया आकार लेने लगी. बाँस की छोटी-छोटी पतली खपच्चियों को मोड़कर, उसे सुतली से बाँधकर और उस पर फिर मिट्टी चढ़ाकर सोनाबाई ने नाना आकारों की झिंझुरी बनाई और तब उस पर कहीं ढोल बजाते आदमी, कहीं झाँकता हुआ शरारती बच्चा, कहीं बिल्ली, शेर, गाय, चिड़िया, साँप सब एक-एक कर प्रकट होने लगे. धीरे-धीरे बरामदे से लगी कमरे की बाहरी दीवारें भी विस्तृत लैण्डस्केप में बदल गईं जिस पर कहीं पीपल की फैली डालों पर उत्पात मचाते बंदर थे, तो कहीं सींग से सींग भिड़ाकर लड़ते बैल थे. दूर क्षितिज पर एक दूल्हा अकेला ही घोड़े पर चढ़कर जा रहा था और दीवार के दूसरे छोर पर लड़के-लड़कियों का सैला नृत्य करता समूह गुज़र रहा था. दीवार पर जगह-जगह घने देथा (आलों) में कहीं बकरी शेर के साथ बैठी थी तो कहीं बंसी बजाते हुए कृष्ण विराजमान थे. सोनाबाई के हाथ जैसे रूकने का नाम ही नहीं लेते थे. यह सिलसिला कई वर्षों तक चला. घर का कोई कोना अब सूना न था, हर तरफ जीवन था. दोंदकी- वह कोठी जिसमें अगले वर्ष के लिये बीज रखा जाता है, वह भी गाय-बैलों की आरामगाह बन गई थी. अपने
सूने मकान और उसमें अपने अकेलेपन के इर्द-गिर्द सोनाबाई ने जीवन का ऐसा मेला रचा जिसमें तमाम ऋतुएँ, त्यौहार, जंगल, खेत-खलिहान लहलहा उठे. अपने अकेलेपन से ऐसा मौलिक प्रतिशोध?

एक क्षण के लिये भ्रम होता है कि बात पारंपरिक कलाकार की नहीं बल्कि किसी आधुनिक चेतना के कलाकार की हो रही है. लेकिन जो जीवित है उसी को तो परंपरा कहेंगे और वह जीवित तभी बच सकती है जब उसकी सिंचाई नित नये विचारों, रूपाकारों से हो.

सोनाबाई से मैंने यह प्रश्न दो साल पहले और पन्द्रह साल पहले भी पूछा था कि उन्होंने यह काम किससे सीखा? उनका जवाब यही था- “माँ से सीखा.” लेकिन इस संबंध में जो तथ्य सामने आये वो बेहद चौंकानेवाले हैं.

1983 में भारत भवन, भोपाल की आदिवासी तथा लोककला दीर्घा के लिये संकलन करने हेतु एक दल सरगुजा के गाँवों में पहुंचा. वहाँ के लोग मुख्य रूप से मिट्टी की पकी हुई चीज़ें खोज रहे थे. तभी अम्बिकापुर गेस्ट हाउस के चौकीदार ने पुहपुअरा की सोनाबाई के घर का हवाला दिया दल, जिसमें प्रसिध्द चित्रकार, छायाकार ज्योति भट्ट भी थे, सोनाबाई के घर पहुंचा तो उनकी सिरजी दुनिया को देख दंग रह गया. चँकि सोनाबाई ने तब भी उन्हें यही बताया था कि यह काम परंपरा से होता आया है और उन्होंने अपनी माँ से सीखा था इसलिये दल के सदस्यों ने उस गाँव और आस-पास के गाँवों का हर घर छान डाला. पर वैसा काम पूरे इलाके में कहीं नहीं मिला. हाँ जिसे छोहा लिपाई कहते हैं, वह ज़रूर कई घरों में थी.

ऐसे अनेक लोग जो यह मानते हैं कि परंपरा तो वह है जिसमें बदलाव नहीं है, जिसमें व्यक्तिगत हस्ताक्षर की जगह नहीं है, जो ज्यों की त्यों पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती जाती है, उनके लिये यह उदाहरण विचलन पैदा करने वाला होना चाहिए.

1983 में सोनाबाई को दिल्ली में राष्ट्रपति सम्मान तथा 1986 में भारत भवन, भोपाल में तुलसी सम्मान मिला. देश-विदेश के लोगों का उनके घर ताँता लग गया जो आज भी जारी है. कई विदेशी दौरे भी करने पड़े. इस सब से इलाके में उनका मान-सम्मान बढ़ा और इलाके की बहुत- सी स्त्रियों ने अपने हाथ में चिखला धर अपने घरों को सजाना शुरू किया. आज इस इलाके की कई अन्य प्रतिष्ठित कलाकार भी हैं. भारत भवन के लोग जब खासा दाम देकर सोनाबाई की बनाई कुछ चीज़ें ले गये तब सोनाबाई के पति होलीराम का चकित होना लाज़मी था. उन्होंने क्या सोचा था कि उसकी हर दम चिखला में हाथ साने रहने वाली पत्नी रजवार समाज और उसके घर के लिये इतना सम्मान लायेगी. सोनाबाई को लेकिन इन तमाम सम्मान आदि से जैसे कोई लेना-देना ही नहीं था. वे कहती थीं “ घर के बाहर जैसे ही कोई गाड़ी आकर रूकती थी तो मैं छुप जाती थी, क्योंकि मुझे कहीं भी जाने से डर लगता था.”

सोनाबाई का पूरे इलाके में ऐसा ज़बरदस्त असर है कि किसी कला महाविद्यालय का भी क्या होता होगा.उनके अदृश्य विद्यालय से कितने ही स्नातक जिनके कारण दुनिया में ‘रजवार पेन्टिंग’, ‘रजवार क्ले रिलीफ’ का आज नाम है किंतु जाहिर है सोनाबाई को इसका श्रेय लेने में कोई दिलचस्पी नहीं थी.

अभी चार-छ: माह हुए पता चला कि सोनाबाई नहीं रही. दो वर्ष पूर्व जब मैं सरगुजा, उनके घर गई थी तो वे मुझे अपने घर के बाहर चबूतरे पर बैठी मिलीं थीं. बरसात के दिन थे, घर के बेटे-बहु बल्कि आसपास के सारे स्त्री-पुरुष खेतों में रोपा लगाने गए हुए थे. सोनाबाई, सामने फैले खेतों के विस्तार को देखती हुई चबूतरे पर प्रकृतिस्थ बैठी थीं- वैसे ही जैसे खेतों के उस पार पिल्खा पहाड़ बैठा था.

लेखिका : शंपा शाह

Monday, September 15, 2008

हथियारबंद बचपन....

साभार: वेबदुनिया

अमेरिका स्थित मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वाच ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट में खुलासा किया है कि छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में सरकार और माओवादी दोनों ही बच्चों का हथियारबंद संघर्ष में इस्तेमाल कर रहे हैं।


कुल 58 पृष्ठों की इस रिपोर्ट में केंद्र सरकार का उद्देश्य छत्तीसगढ़ सरकार के अधिकारियों और जनजागरण अभियान सलवा जुडूम के तहत बनाए गए शिविरों में रहने वाले 160 लोगों के बयान हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के 29 राज्यों में से आधे राज्यों में माओवादी हिंसा फैल चुकी है। पिछले 20 वर्षों से जारी इस हिंसा में लगभग छह हजार लोग मारे जा चुके हैं।

खतरनाक ड्यूटी, बच्चे और छत्तीसगढ़ का संघर्ष शीर्षक की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को हथियारबंद संघर्ष में शामिल करने से उनके घायल होने और मारे जाने का खतरा रहता है, जो अंतरराष्ट्रीय कानूनों का खुला उल्लंघन भी है।

मानवाधिकार संगठन की ओर से बच्चों की वकालत करने वाले जो बेकर ने एक विज्ञप्ति में कहा है कि छत्तीसगढ़ में बच्चों को सशस्त्र संघर्ष में झोंककर सरकार और नक्सलियों द्वारा बच्चों का इस तरह शोषण करना शर्मनाक है।

विज्ञप्ति के अनुसार नक्सली अपने दलों में 16 साल से कम उम्र के बच्चों की भर्ती करते हैं। सरकार समर्थित नक्सल विरोधी अभियान सलवा जुडूम में भी बच्चों का उपयोग हो रहा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार ने राष्ट्रीय बाल अधिकार आयोग के समक्ष भी यह स्वीकार किया है कि कम उम्र के बच्चों को एसपीओ के पद पर भर्ती किया गया था, क्योंकि उनके पास उम्र का कोई प्रमाणपत्र नहीं था।

गौरतलब है कि वर्ष 2005 में दंतेवाड़ा और बीजापुर जिले में 3500 एसपीओ की भर्ती की गई थी, जिनमें कम उम्र के बच्चों की संख्या अधिक थी। पुलिस ने बाद में यह गलती स्वीकार करते हुए 150 बच्चों को एसपीओ के पद से हटा दिया था।

दूसरी ओर केंद्रीय गृह मंत्रालय की इस वर्ष की रिपोर्ट में सलवा जुडूम अभियान में बच्चों को शामिल किए जाने का खंडन किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि नक्सलियों ने बच्चों को जबरन अपने दल में शामिल करने की कोशिश की और उनके इनकार करने पर नक्सलियों ने बच्चों के परिजनों को प्रताड़ित किया या उनकी हत्या कर दी।




Friday, August 29, 2008

यह तो महात्मा गांधी का रास्ता नहीं

साभार : रविवार.कॉम

रायपुर में छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम, 2005 की वापसी तथा इस अधिनियम के तहत गिरफ्तार तमाम निर्दोष लोगों, जैसे डॉ. विनायक सेन, अजय टीजी, साई रेड्डी, आदि, की रिहाई हेतु आयोजित दस दिवसीय उपवास पर एक लेख के माध्यम से छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक एवं साहत्यिकार विश्वरंजन ने टिप्पणी की है कि यदि गांधी आज जीवित होते तो शायद बस्तर के जंगलों में अकेले जा कर माओवादियों से कहते कि, 'मित्र! हिंसा छोड़ो, जो तुमसे असहमत हैं, उन्हें मारना छोड़ो, हम तुम्हें अब नहीं मारने देंगे. तुम्हे आदिवासियों को मारने के पूर्व हमें मारना पड़ेगा. हम उफ्फ तक नहीं करेंगे. हम हाथ तक नहीं उठाएंगे...

यह बात तो विश्वरंजन जी भी स्वीकार करेंगे कि राज्य की जो पुलिस व सेना के रूप में हिंसक शक्ति है वह नक्सलवादियों या किसी भी गैर राज्य हिंसक शक्ति से बड़ी है. विश्वरंजन जी जो बात गांधी के मुंह से गांधीवादियों के लिए कहलवाना चाहते हैं वही बात हम विश्वरंजन जी की पुलिस व उसके द्वारा समर्थित 'सलवा जुडूम नामक गैर संवैधानिक सशस्त्र बल के लिए कहना चाहेंगे. विश्वरंजन जी के अनुसार गांधी किसी भी हालत में उस समूह के साथ नहीं खड़े होते जिसका बुनियादी फलसफा हिंसा और आतंक पर टिका हुआ है. इसीलिए हम विश्वरंजन साहब को बताना चाहते हैं कि हम उनकी पुलिस, सलवा जुडूम व उनकी सरकार के साथ नहीं खड़े हैं.

इसका यह मतलब कतई नहीं है कि नक्सलवादियों द्वारा की गई हिंसा को जायज ठहराया जा सकता है. कुल मिलाकर विश्वरंजन जी जब नक्सलवादी हिंसा की बात करते हैं तो वे यह नहीं भुला सकते कि नक्सलवादी हिंसा असल में राज्य हिंसा के जवाब में प्रति हिंसा है. इस राज्य हिंसा में प्रत्यक्ष हिंसा तो शामिल है ही जिसके अंतर्गत लोग पुलिस सेना व सलवा जुडूम द्वारा की गई हिंसात्मक कार्रवाईयों के शिकार हुए हैं, लेकिन ज्यादा महत्वपूर्ण वह अप्रत्यक्ष हिंसा है जिसके तहत एक लंबी अवधि के दौरान आम लोगों को उनकी न्यूनतम मजदूरी, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत अनाज, मूलभूत चिकित्सा व अन्य सुविधाओं से वंचित कर उन्हें घुट-घुट कर मरने के लिए मजबूर किया गया है.

यह शोषण व भ्रष्टाचार की व्यवस्था तो विश्वरंजन साहब नक्सलवाद से पुरानी समस्याएं हैं और आपकी राज्य व्यवस्था ने स्थिति को ठीक करने के लिए कोई भी ठोस कदम नहीं उठाया. बिना नक्सलवाद के मूल कारणों का विश्लेषण किए तथा नक्सलवाद के पनपने में राज्य व्यवस्था की भूमिका की बात किए बिना नक्सलवाद को सिर्फ कोसने से कुछ काम नहीं चलेगा. नक्सलवाद के पनपने का सीधा-सीधा मतलब है कि राज्य असफल रहा है. यदि राज्य ने अपने सभी नागरिकों को उनकी मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु साधन उपलब्ध कराए होते तथा उन्हें सम्मान व सुरक्षा के साथ जीने का मौका उपलब्ध कराया होता तो शायद हमें आज नक्सलवाद की समस्या का सामना ही न करना पड़ता. नक्सलवाद की समस्या के निश्चित सामाजिक आर्थिक-राजनीतिक कारण हैं और उसका समाधान भी सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक क्षेत्रों में ही ढूंढ़ना होगा. नक्सलवाद की समस्या का समाधान सलवा जुडूम कतई नहीं हो सकता. राज्य व्यवस्था को अपने चरित्र में परिवर्तन लाना पड़ेगा. उसे सिर्फ संपन्न वर्ग, जिसमें अब ठेकेदार, कंपनियां व माफिया भी शामिल हैं, के संरक्षक की भूमिका छोड़कर आम गरीब वंचित नागरिकों का हितैषी बनना पड़ेगा.

इस बात में तो कोई शक है ही नहीं कि गांधी कभी भी नक्सलवादियों के हिंसा व आतंक के फलसफे का समर्थन नहीं करते लेकिन, विश्वरंजन साहब ने आज जिस शासन-प्रशासन तंत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं उसका भी कभी समर्थन नहीं करते. गांधी की ग्राम स्वराज्य व्यवस्था में तो हिंसा व आतंक के तरीकों का इस्तेमाल करने वाली पुलिस व सेना का कोई स्थान हो ही नहीं सकता. वह पुलिस जो आम नागरिकों के लिए दहशत का प्रतीक है को गांधी कभी स्वीकार करते ही नहीं. आपके थानों में जहां आम इंसान अपमानित होता है, साधारण सी प्राथमिकी भी दर्ज नहीं होती, 'पहुंच वाले अपराधी खुले घूमते हैं तथा निर्दोष लोगों को पकड़ कर जेलों में डाल दिया जाता है ऐसी व्यवस्था के मुखिया हैं आप यदि आज एक संवेदनशील साहित्यकार हैं तो हम आपसे यह तो उम्मीद नहीं ही करेंगे कि आप एक फासीवादी सरकार की सेवा करते हुए उसके फासीवादी तरीकों को जायज ठहराएंगे.

चलिए हमारी हिम्मत नहीं है कि हम जाकर बस्तर के जंगलों में नक्सलवादियों को अहिंसा का पाठ पढ़ा सके, लेकिन आपके पास तो पूरा तंत्र है. किसी भी गांधीवादी की संस्था से बहुत ज्यादा साधन आपके पास हैं. नक्सलवाद से लड़ने के लिए केंद्र सरकार ने आपको असीमित साधन उपलब्ध कराए हैं.

आप ही कुछ गांधीवादी तरीकों का प्रयोग क्यों नहीं करते? क्या आप पुलिस की व्यवस्था को और मानवीय बना सकते हैं? क्या आप प्रदेश के पुलिस मुखिया होने के नाते ऐसा माहौल बना सकते हैं कि आज गरीब नागरिक को पुलिस से डर न लगे और वह पुलिस को मित्र के रूप में स्वीकार कर सके? जब आम इंसान थानों में जाए तो उसका स्वागत गालियों से न हो बल्कि उसे सम्मानपूर्वक बैठाया जाए. क्या आपकी पुलिस लोगों को सुरक्षा प्रदान करने के साथ अन्य सरकारी योजनाओं, जैसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली, वृध्दावस्था- विधवा पेंशन, गरीबों के लिए आवास, भूमिहीनों के लिए पट्टे, मूलभूत शिक्षा स्वास्थ्य सुविधाएं तथा राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का पूरा-पूरा लाभ, बिना किसी भ्रष्टाचार के, उपलब्ध करा सकती है.

फिलहाल तो लोगों को छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के तहत न्यूनतम एक सौ दिनों का रोजगार नहीं मिल रहा. व्यापक स्तर पर धांधली अलग है. राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम भी एक राष्ट्रीय कानून है. क्या इस कानून की खुलेआम धाियां उड़ाने वाले अधिकारियों-कर्मचारियों-जनप्रतिनिधियों- ठेकेदारों के खिलाफ आज छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम या गैर कानूनी गतिविधियां (निरोधक) कानून के तहत कोई कार्रवाईयां कर सकते हैं? क्या पुलिस प्रभावशाली लोगों की संरक्षक बने रहने के बजाए इस देश के आम इंसान के मौलिक एवं कानूनी अधिकारों की संरक्षक बन सकती है? मौलिक सवाल यह है कि क्या आज इस व्यवस्था में मूलचूल परिवर्तन लाने वाले कोई कदम उठा सकते हैं? सलवा जुडूम का प्रयोग तो कोई भी कर सकता है क्योंकि शासक वर्ग की मानसिकता में जनता के किसी उभार को कुचलने के लिए हिंसक रास्ता ही सहज रूप से आता है. किंतु क्या हम आप जैसे संवेदनशील अधिकारी से उम्मीद करें कि वह कोई सृजनात्मक अहिंसक प्रयोग करेगा जिसे वार्क में गांधीवादी श्रोणी में रखा जा सके?

हमारी जो क्षमता है उससे हम सरकार की सभी जन विरोधी नीतियों के खिलाफ बोलते रहेंगे. नक्सलवादियों की हिंसा का हम समर्थन नहीं करते. किंतु राज्य की ताकत व भूमिका नक्सलवादियों से बड़ी है. राज्य से हम उम्मीद करते हैं कि वह अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियां ठीक से निभाएगा. हमारा मानना है कि राज्य ही नक्सलवाद की समस्या के उभरने के लिए जिम्मेदार है तथा वही अपनी नीतियों में परिवर्तन कर इस समस्या पर काबू भी पा सकता है. हमारे लिए छत्तीसगढ़ विशेष जनसुरक्षा अधिनियम व गैर कानूनी गतिविधियां (निरोधक) अधिनियम के खिलाफ संघर्ष लोकतंत्र को बचाने संघर्ष है. समस्या पेचीदी है तथा समाधान भी आसान नहीं है यह आप भी जानते हैं. अत: नक्सलवाद की समस्या पर बहस को सिर्फ हिंसा-अहिंसा के पक्ष या विरोध में बहस तक सीमित न करें. अच्छा होगा यदि आप अपने कौशल का प्रयोग नक्सलवाद की समस्या के मानवीय समाज में लगाएं. जब तक आपके तरीके नहीं बदलते तब तक हम आपकी सरकार के खिलाफ बोलते रहेंगे तथा उपवास जैसे कार्यक्रमों का भी आयोजन करेंगे.

आपको याद है न गांधी ने क्या कहा था स्वराज्य के बारे में. स्वराज्य का मतलब सिर्फ कुछ लोगों द्वारा सत्ता प्राप्त कर लेना नहीं बल्कि बहुसंख्यक जनता के अंदर यह शक्ति पैदा होना है कि वह कुछ लोगों द्वारा सत्ता के दुरुपयोग का प्रतिकार कर सके. सलवा जुडूम सत्ता का दुरुपयोग है. लोगों के हाथ में हथियार देना कोई बुध्दिमानी पूर्ण कार्रवाई नहीं कही जाएगी. क्या हम इतिहास से यह सबक नहीं सीखेंगे कि जब भी गैर राज्य शक्तियों को हथियारों से लैस किया गया है वह कुछ समय के बाद अनियंत्रित हो जाती है तथा समाज के लिए घातक हो जाती हैं.

आखिर सलवा जुडूम के माध्यम से लोगों को गांव छोड़कर शिविरों में रहने के लिए क्यों मजबूर किया जा रहा है? लोगों को उनके गांवों, खेतों, जंगलों से उजाड़कर उन्हें अपनी आजीविका के लिए भी मोहताज बनाकर हम उन्हें कैसी सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं? छत्तीसगढ़ प्राकृतिक संसाधनों में धनी है. फिर भी विडम्बना यह है कि लोग गरीब एवं लाचार.

गांधी के ग्राम स्वराज्य विचार के मुताबिक तो गांवों को ही सिर्फ यह अधिकार है कि वे अपनी व्यवस्था कैसे बनाएं. गांवों में प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन कैसे होगा, गांव में शिक्षा स्वास्थ्य सुरक्षा की व्यवस्था कैसी होगी यह तय करने का अधिकार स्थानीय लोगों को ही है. किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि छत्तीसगढ़ सरकार अपने प्राकृतिक संसाधनों पर से स्थानीय लोगों का अधिकार समाप्त कर पूंजीपतियों के मुनाफा कमाने के लिए उन्हें इन संसाधनों के खुले दोहन की छूट देना चाहते है.

क्या आप इस तथाकथित विकास के समर्थक हैं विश्वरंजन जी? यह विकास तो गांधी के विचारों के अनुकूल है नहीं. यदि आप नक्सलवादियों को नहीं समझा सकते तो कम से कम उन पूंजीपतियों को ही समझा दे कि जनता के प्राकृतिक संसाधनों से अपनी गिध्द दृष्टि हटा ले. यदि आप ये भी नहीं कर सकते तो गांधी के प्रिय विषय मद्यनिषेध पर तो कुछ पहल ले ही सकते हैं. क्या आप सरकार द्वारा शराब को बढ़ावा देने के कार्यक्रम जिससे फायदा सिर्फ शराब माफियों का हो रहा तथा आम इंसान का परिवार बरबाद हो रहा को रोकने के लिए कुछ कदम उठा सकते हैं?

लेखक -
संदीप पांडे