Friday, December 11, 2009

हिंसा बुनियादी तौर पर ग़लत है - विश्वरंजन

देश में सर्वाधिक चर्चित पुलिस अधिकारियों में शुमार किये जाने वाले छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन मानते हैं कि बस्तर या देश के दूसरे हिस्सों में माओवादी बनाम राज्य का संघर्ष तभी खत्म हो सकता है, जब हिंसा को एकमात्र रास्ता मानने वाले लोगों की बुनियादी समझ में बदलाव आय़े. उनका मानना है कि माओवादियों से सैद्धांतिक रुप से लड़ना होगा और उनकी हिंसा से भी. लेकिन विश्वरंजन यह भी स्वीकारते हैं कि जब तक आर्थिक विषमता को दूर नहीं किया जाएगा, तब तक ऐसे चरमपंथी आंदोलन समाज में अपनी जगह बनाते रहेंगे. यहां पेश है, उनसे की गयी बातचीत.

एक कविता है- हिचकॉक और ज़िंदगी. एक समय था/ जब मुझे हिचकॉक द्वारा बनाया गया सिनेमा देखना/ अच्छा लगता था/ सिनेमा क्या ख़ून ही ख़ून/ चीख ही चीख/ एक बंदूक यहां / एक चाकू वहां / सिर पर लाठी का एक प्रहार/ और आसमान का लाल ही होते जाना सहसा/ कितना वीभत्स और/ कितना मज़ेदार/ आज नहीं देखता हूं मैं हिचकॉक की फ़िल्म/ आज हम सब ख़ुद हिचकॉक के पात्र बनते जा रहे हैं/ वीभत्स और मज़ेदार. अपनी इस कविता को आप किस तरह analyze करेंगे.

विश्वरंजन – देखिए कविता को तो हम कभी analyze नहीं करते हैं, लेकिन आप इसको इस तरह से देखिए कि जो संवेदनशीलता है हिंसा के प्रति हमारी इतनी भोथरी होती जा रही है समाज की, कि बहुत सारी चीज़ें हमें उद्वेलित ही नहीं करती है. हम खुद हिंसा में कहीं ना कहीं डूबते नज़र आ रहे हैं. और जो हमारी संवेदना है जीवन के प्रति या ज़िंदगी के प्रति, वो भोथरी हो रही है. हम जब एक कटा हुआ सिर देखते हैं, बस्तर के जंगलों में, कीड़े लगते हुए. वो मेरे spy का भी हो सकता है, किसी और का भी हो सकता है लेकिन पुलिस को जाना ही पड़ता है body लाने के लिए. हो सकता है 48 घंटे के बाद हम पहुँच रहे हैं और उस समय हम उसको अपने अंदर उतार भी नहीं पाते हैं. हम सब कहीं न कहीं हिंसा से इतने जुड़े हैं कि खुद हिचकॉक की फ़िल्म के पात्र बनते जा रहे हैं. जबकि हिचकॉक के पात्र आपको उद्वेलित करने के लिए, उस तरह के पात्र बनाए गये थे. हिचकॉक की फ़िल्म आपको कितनी भी मज़ेदार लगे, आपको एक स्तर पर इतनी उद्वेलित करती थी कि आप हिंसा के खिलाफ खड़े होते थे. आज हिंसा इस कदर फैल रही है समाज में, कि जो shock , जो झटका हमें मिलना चाहिए था, आज समाज में वो नहीं मिल रहा है. आज समाज में वो चीज़ नहीं आ रही है, समाज उसको एक सामान्य-सी हक़ीकत मानके बढ़ा चला जा रहा है. ये सोच था, ये महसूसता था, जब ये कविता लिखी गई थी.

छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्वरंजन से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत

Monday, October 5, 2009

वेदांता की मौत की चिमनी

छत्तीसगढ़ के बालको में घरों को रौशन करने के लिए बनाई जा रही विशाल चिमनी ने ही सैकड़ों घरों को हमेशा-हमेशा के लिए अंधेरे में डूबा दिया है. इस घटना को दस दिन हो गये हैं लेकिन अब तक 41 मज़दूरों की हत्या की जिम्मेवारी तक तय नहीं हुई है. हालत ये है कि वेदांता की इस चिमनी में कितने मज़दूर काम कर रहे थे, इसका आंकड़ा भी छत्तीसगढ़ सरकार के पास नहीं है.
बालको नगर से आलोक प्रकाश पुतुल की रिपोर्ट
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Sunday, August 2, 2009

मुख्यमंत्री रमन सिंह के नाम खुला पत्र

साभार : रविवार.कॉम

मुख्यमंत्री जी,

राज्य के पुलिस प्रमुख और अन्य प्रशासकीय तथा राजनीतिज्ञ सलाहकारों से सहमत होते हुए बुद्धिजीवियों और मानव अधिकार कार्यकर्ताओं को लगभग उलाहने के स्वर में आपने यही बार-बार आव्हान किया है कि वे राज्य सरकार की आलोचना करने के बदले नक्सलियों के खिलाफ क्यों नहीं लिखते. आपकी 'रियाया' होने के कारण मैंने इस सलाह पर अमल किया है और समाचार पत्र इसके प्रमाण हैं.

यह अलग बात है कि नक्सली हिंसा के बरक्स राज्य की हिंसा एक बड़ा खतरनाक प्रयोग है जो आज़ादी के बाद से ही भारत की चिंता का विषय रहा है. छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद नासूर की तरह फैल गया है. वह मलेरिया के बुखार की तरह आए दिन मनुष्यता को ही तबाह करता है और बाकी दिन जब ऐसे बुखार की तरह तापमान छोड़ देता है जिसे सामाजिक थर्मामीटर माप नहीं पाता, तब सरकारी तंत्र के अत्याचार बदस्तूर कायम रहते हैं.

मुख्यमंत्री जी, बुद्धिजीवी, मानव अधिकार कार्यकर्ता, लेखक और कलाकार किसी कौम, वंश या प्रतिबद्धता के नहीं होते. यदि होते हैं तो उनकी अभिव्यक्ति भोथरी हो जाती है. यह सुनना अच्छा लगता है कि राज्य सत्ता बुद्धिजीवियों को तुरही बजाकर विचारों के मूल्य युद्ध में जुट जाने का आव्हान करती है. क्या राज्य और बुद्धिजीवियों का इतना ही रिश्ता है कि बुद्धिजीवी केवल राज्य के कहने पर सरकारी अजान दें और राज्य एक बौद्धिक नूराकुश्ती या हमख्याली की खबरें प्रकाशित करता रहे. क्या राज्य ने कभी बुद्धिजीवियों से सहकार करने की कोशिशें की हैं? छत्तीसगढ़ निर्माण के बाद किसी सरकार ने कभी राज्य के हालात और भविष्य को लेकर अभिव्यक्ति के सिपाहियों से बात तक करने की जरूरत नहीं समझी.

मानस-पुत्रों से मेरा आशय केवल उन कथित रचनाधर्मियों से नहीं है जो राज्य सत्ता पर निर्भर रहे बिना अपने अभिव्यक्त होने को निरर्थक मानते हैं. समाज के चिंतकों में सेवा निवृत्त बुजुर्गों, अध्यापकों, लेखकों, कलाकारों, सेवानिवृत्त फौजी और पुलिस अधिकारियों, शिक्षित उद्योगपतियों, खिलाड़ियों, अर्थशास्त्रियों, समाज सेवकों, राजनीति से तौबा कर चुके अनुभवी जनसेवकों, प्रबुद्ध महिलाओं, वैज्ञानिक नवोदय के तीक्ष्ण बुद्धि के युवजनों, विधि विशेषज्ञों, चिकित्सकों, इंजीनियरों तथा प्रयोगधर्मी कृषकों आदि की जमात से है. वे किसी भी सभ्य समाज की रचना, निरंतरता और विकास के स्थायी आधार स्तंभ होते हैं.

आप छत्तीसगढ़ के माटी पुत्र होने के नाते हमारी स्थायी संपत्ति हैं. आयुर्वेदिक डॉक्टर के रूप में आप एक जागरूक जनसेवक हैं. राजनीतिज्ञ के रूप में आपने स्वेच्छा से एक बड़ी भूमिका का चुनाव किया है. लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी एक संयोग है. आपमें छत्तीसगढ़ के लिए ढेरों चिंताएं होंगी लेकिन छत्तीसगढ़िया होने से जो अनुभूति होती है, उसे मुख्यमंत्री की अभिव्यक्ति बनते बहुत गड़बड़ हो जाती है.

मुख्यमंत्री जी, हमारे संविधान में राज्यपाल नामक पद है जिस पर यह बाध्यता है कि वह मंत्रि परिषद की सलाह से काम करेगा सिवाय कुछ महत्वपूर्ण मसलों को छोड़कर. मंत्रि परिषद पर ऐसी कोई बाध्यता नहीं है. कार्यपालिका के रूप में उसे नौकरशाहों को निर्देश देने के अधिकार हैं उनसे निर्देशित होने के नहीं. लेकिन अमूमन मंत्रि परिषदें नौकरशाहों पर उसी तरह निर्भर हो जाती हैं जिस तरह किसी भवन का प्रथम तल निर्भर होता है भूतल पर. यह क्यों होना चाहिए और क्यों हो रहा है? नक्सल समस्या को ही लें. सरकारी फाइलों पर ऊपर लिखित सभी तरह के नागरिकों और विधायिका के

प्रतिनिधियों से सलाह मशविरे और उनकी भूमिका का नगण्य उल्लेख मिलेगा. उसमें नौकरशाही और पुलिसिया सिफारिशों की भरमार होगी. केवल क्रियान्वयन के अर्थ में नहीं सलाह देने के अर्थ में भी. नक्सल समस्या एक प्रदूषण है. वह प्रत्येक छत्तीसगढ़वासी के जीवन को तकलीफदेह बना रही है. जो भुक्तभोगी हैं उनसे क्या कभी कुछ मशविरा किया जाता है? या उन्हें इस लायक भी समझा जाता है?

मुख्यमंत्री जी, यह आई ए एस और आई पी एस क़ी नौकरशाही सड़ी गली अंग्रेज व्यवस्था की देन है. गांधी जी ने इसका विरोध किया था और मौजूदा संसदीय पद्धति का भी. बीसवीं सदी की दुनिया की सबसे मशहूर कृति 'हिंद स्वराज' में तत्कालीन भारत की खस्ता हालत का उस ऐतिहासिक परेशान दिमाग व्यक्ति ने जो खाका खींचा था उसमें भविष्य के भारत के बीजाणु भी छितराए थे. क्या हमारी सरकारें जनता के साथ किया जाने वाला सलूक 'हिन्द स्वराज' के प्रस्थान बिन्दु के साथ स्वीकार करना चाहेंगी?

भारतीय संसदीय पद्धति में चुनाव जीतना और कुर्सियों पर फिट होना दुर्घटना, भाग्योदय या संयोग है. बर्फ की सिल्लियों को चट्टान समझने की भूल की जाती है. जो नागरिक हैं उन्हें केवल मतदाता समझ लिया जाता है. देश में भूकंप, बाढ़ या ज्वालामुखी फट पड़ने पर तबाही का शिकार जनता होती है. राजनेता उससे धैर्र्य रखने की अपीलें करते हैं. वह टैक्स देती है. भुखमरी झेलती है. महंगाई से कराहती है. आत्महत्या करती है. राजनीतिक क्षय के रोग के कारण पीली पड़ती चली जा रही है

लेकिन यदि वह उफ करती है तो उसे बगावत समझ लिया जाता है.

मुख्यमंत्री जी, इसमें कोई शक नहीं कि समाज के श्रेष्ठि वर्ग में नपुंसकता रही है. हमारी सदी के दो महानतम विचारकों विवेकानंद और गांधी ने अपनी तल्ख भाषा में इस ऐतिहासिक सत्य का उद्घाटन किया है. उन्होंने भारतीय संस्कृति, सभ्यता और पूरी भारतीयता का आधार किसानों, मजदूरों और गरीबों को माना है. साथ साथ महिलाओं और युवकों को भी. नक्सलवाद इन्हीं वर्गों पर श्रेष्ठि वर्ग का हमला नहीं तो और क्या है? राज्य सत्ता के अंग्रेजियत बुद्धि के कुछ नौकरशाह अपेक्षाकृत अल्प शिक्षित राजनीतिज्ञों को कंधे की तरह इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं तो और क्या है?

तथाकथित नक्सलवाद के सरगना भारत के बाहर के कुछ उग्र राजनीतिक विचारों को एक अलग बौद्धिक, भौगोलिक और ऐतिहासिक संदर्भ में जबरिया ठूंसने का प्रयत्न कोई चालीस वर्षों से कर रहे हैं. यह विचारधारा पूरी तौर पर भारतीय परंपराओं और संविधान के विपरीत है. यह जनग्राह्य नहीं होती इसलिए नक्सली बंदूक का सहारा लेते हैं. सरकारें विचारधारा के स्तर पर मुकाबला करने के उपक्रम में सरकारी नुमाइन्दों द्वारा तैयार की गई प्रेस विज्ञप्तियां जारी करती हैं. वे नौकरशाह ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को संभालते हैं. लिहाज़ा होता यह है कि जो मुफलिस हैं वे अपने ऊपर सरकारी प्रचार को आक्रमण मानते हैं.

समाज एक सांस्कृतिक समास है. क्या नागरिक समाज इस अर्थ में सरकार का अंग नहीं हैं? उसकी केवल तमाशबीन की भूमिका क्यों समझी जाती है? सरकारें नक्सलवादियों से तो संवाद करना चाहती हैं लेकिन समाज के मानसपुत्रों से नहीं. सरकारी विज्ञप्तियां समाचार पत्रों के अतिरिक्त प्रदेश के चुनिंदा बुद्धिजीवियों को पृथक से नहीं भेजी जातीं. लेकिन नक्सलवादी बाकायदा ऐसा संपर्क उनसे करते रहते हैं.

अब यदि किसी बुद्धिजीवी के पास नक्सली साहित्य, चिट्ठियां पर्चे, सीड़ी संयोगवश मिल गये (जिनको बुद्धि विलास की खुशफहमी में रहने के कारण नष्ट नहीं किया गया) तो वे बाकायदा नक्सलवादियों के रूप में पकड़ लिए जायेंगे. आपकी सरकार ने देश के इतिहास का सबसे खतरनाक जनविरोधी कानून भी बना रखा है. यह अलग बात है कि उसके बावजूद नक्सल गतिविधियां बढ़ती ही जा रही हैं.

आपकी सरकार ने देश के इतिहास का सलवा जूडूम नामक पहला प्रयोग भी कर रखा है. वह बढ़ते नक्सलवाद के सामने बौना पड़ता जा रहा है. हिंसा के खिलाफ जन प्रतिरोध एक सामाजिक लक्षण है. महात्मा गांधी ने तो अंग्रेज़ की हिंसा के खिलाफ उसको हवा दी थी और सफल रहे थे. क्या नक्सलवादी अंग्रेज़ शासकों से ज्यादा शक्तिशाली हैं और क्या छत्तीसगढ़ की जनता में हिंसा का प्रतिरोध करने की नीयत, कूबत और शक्ति समाप्त हो गई है. जो तटस्थ हो जाते हैं, वक्त उनका भी इतिहास लिख देता है.

मुख्यमंत्री जी, नक्सली कहते हैं कि वे एक जन आंदोलन चला रहे हैं. चारु मजूमदार, कानु सान्याल और जंगल सन्थाल वगैरह के विचारों को मैंने पढ़ा है. नक्सलवाद को लेकर मुझ जैसे सैकड़ों बुद्धिजीवियों की अपनी अपनी निजी और सामूहिक समझ भी है. कवियों को केवल कविता पढ़ने की सरकारी फीस दी जाती है. तुलसी जयंती, निराला जयंती तथा ग़ालिब जयंती वगैरह के आयोजनों में जो शिरकत करते हैं उतनी ही बुद्धिजीविता की उनकी भूमिका समझी जाती है. विधान सभा अध्यक्ष और मंत्री उनसे सत्कार ग्रहण करते हैं. कशीदे पढ़वाते हैं. संस्कृति मंत्री पुरस्कार, अनुग्रह राशि और अनुदान देते हैं.

सरकार के नुमाइंदे अकबर की भूमिका में होते हैं और बुद्धिजीवी नवरत्नों की. इतिहास गवाह है कि आइने अकबरी में तुलसीदास के नाम का उल्लेख तक नहीं है. आज अकबर के नवरत्न कहां हैं? लेकिन तुलसीदास की रामचरित मानस मुफलिसों की झोपड़ियों में प्राणपद वायु की तरह प्रवाहित है. मंत्रि परिषदें आएंगी और जाएंगी. बड़े नौकरशाह और कुलपति वगैरह गैर छत्तीसगढ़िया होने के कारण अपने अपने प्रदेशों में लौट जायेंगे. शायद सेवानिवृत्त भूगोल में रह भी जायें. गरीब और लाचार लोग तो मृत्यु के बाद सचमुच कहीं नहीं रहेंगे. राजसत्ता विहीन जो प्रज्ञा पुरुष होते हैं वे ही इतिहास में दर्ज होते हैं.

पंडित रविशंकर शुक्ल जैसे मंत्री और नरोन्हा जैसे नौकरशाह के कुछ अपवादों को छोड़कर सरकारें विस्मृति के तहखानों में कैद हैं. लेकिन 'छत्तीसगढ़िया सबसे बढ़िया' के मुहावरे को चरितार्थ करने वाले गुरु घासीदास, माधवराव सप्रे, गुंडा धूर, सुंदरलाल त्रिपाठी, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, मिनीमाता, ठाकुर प्यारे लाल सिंह, डॉ ख़ूबचंद बघेल, कामरेड प्रकाश राय, कुंजबिहारी लाल अग्निहोत्री, स्वामी आत्मानंद, मुकुटधर पांडेय, देवकीनंदन दीक्षित, राजमोहिनी देवी, सुन्दरलाल त्रिपाठी, रामदयाल तिवारी, कामरेड रूईकर, हबीब तनवीर, रामचंद्र देशमुख, पंढरी राव कृदत्त, नरसिंह प्रसाद अग्रवाल, शंकर गुहा नियोगी, मदन तिवारी, शानी, हरि ठाकुर जैसे कई चुनिंदा जननायक और बौद्धिक हैं जिनके वंशजों को 'सबसे बढ़िया छत्तीसगढ़िया' की शक्ल में सरकार द्वारा चुना जा सकता है.

छत्तीसगढ़ में कुल मिलाकर छत्तीस ऐसे समाज प्रतिनिधियों को रस्मी तौर पर ही चुना जा सके जिनसे यह अपेक्षा की जानी चाहिए कि वे आपके कभी कभार होने वाले आव्हान के अनुरूप सरकारी कोशिशों को सामाजिक सलाहों के अनुरूप लचीला और अमल योग्य बना सकें.

मुख्यमंत्री जी, तटस्थ, वस्तुपरक और संवेदनशील बुद्धिजीवी आपसे स्वयं होकर इन विषयों पर चर्चा करने के लिए समय मांगते रहे हैं लेकिन आपके संपर्क अधिकारी इन गुणों से लबरेज़ कहां हैं. इसलिए जन चौपाल में ऐसे पत्र लिखने की मुझे ज़रूरत महसूस हुई है. मुझे अब भी लगता है कि यदि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक इकाई को एक वैचारिक मनुष्य के रूप में तब्दील किया जाए तो छत्तीसगढ़ के उन निरीह, अशिक्षित और बेहद गरीब आदिवासियों को ज़रूरी समझाइश, आर्थिक उन्नयन, कानूनी सहायता और सामाजिक स्वीकार्यता के आयामों को सुदृढ़ करके नक्सलवाद से बचाया जा सकता है.

इसके लिए केवल सुरक्षा बलों की ज़रूरत नहीं होगी. पुलिस तो हमारी अतिरिक्तता है. वह समाज का अंतर्भूत अवयव नहीं है. सेना और पुलिस में जितनी कमी होगी समाज में उतनी ही सुदृढ़ता होगी. नक्सलवाद का नेतृत्व तो पड़ोसी राज्यों बंगाल, बिहार, आंध्रप्रदेश और उड़ीसा से आया है. उसका मूल छत्तीसगढ़ में नहीं है. आप आंकड़े उठाकर देखें जितने कथित नक्सली मारे गये हैं, उनमें इन पड़ोसी राज्यों के बल्कि और सुदूर प्रदेशों के कितने नक्सली शामिल हैं?

छत्तीसगढ़ में जन युद्ध के नाम पर गृह युद्ध हो रहा है. बस्तर में ज्यादा और सरगुजा में कम. दोनों तरफ आदिवासी हैं. दोनों तरफ पेट भरने की लाचारी है. दोनों तरफ उनके हक तथा हिस्से की पूंजी में से राजनीतिक चौथ वसूली जा रही है. दोनों तरफ हिंसा का मुकाबला है और लगभग एक जैसे हथियारों से. नक्सलवादी की परिभाषा भी बहस मांगती है. जिनमें हिंसक विचार है कानून की दृष्टि से वे ही नक्सलवादी हैं. जो पूरी तौर पर निरक्षर हैं. छत्तीसगढ़ी तक नहीं जानते हैं.

भारत के किसी नेता को नहीं पहचानते हैं. जिनके पास तन ढंकने को वस्त्र नहीं है. जिनके जंगल टाटा और एस्सार समूह के आने वाले उद्योग छीन रहे हैं. जिनकी संस्कृति विदेशों में बिकाऊ माल की तरह खपाई जा रही है. हमारा महान करमा नृत्य सरकारी कार्यक्रमों में राज दरबार की वस्तु बनाया जा रहा है. आदिवासियों के चेहरे का भोलापन और मुस्कान भारतीय संस्कृति का उत्स रहा है. 'जयश्री राम' में विश्वास रखने वाले लोगों को तो शबरी के चरित्र के प्रति श्रद्धा होनी चाहिए और कुब्जा के प्रति भी. अंग्रेज़ी में जिसे बॉडी लैंग्वेज कहते हैं, उसी मासूम चेहरे के कारण ही तो आपकी लोकप्रियता है. उसमें से भी छत्तीसगढ़ की सहजता झांकती रहती है.

मुझ जैसे कई लोग हैं जिनके पास नक्सली समस्या की तह में जाकर उसके निदान के सुझाव होंगे लेकिन हमें सरकारी तामझाम से परहेज़ होता है. हममें से कुछ लोग नक्सलियों से भी बात कर सकते हैं बशर्ते उनमें गलत ही सही छत्तीसगढ़ी के निर्दोष विचार की अनुगूंजें तो हों. वे तो तालिबान की तरह धन की डकैती करते हैं और हमारे बेहद सीधे सादे आदिवासियों को फिदायीन दस्ते में तब्दील करते हैं.

सरकारी अफसर भी केवल बंदूक की गोली के दम पर नक्सलवाद को खत्म करने का शिगूफा छेड़ते रहते हैं. नक्सलवाद छत्तीसगढ़ की समस्या है, तो हर छत्तीसगढ़ी को अपने स्तर पर इस सामाजिक समस्या का आकलन और हल करने के लिए सुझाव देने का सांस्कृतिक अधिकार है. यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो आने वाली पीढ़ियां हमारे गुम हो गए चेहरों पर भी कोलतार का पोचारा फेरेंगी.

मुख्यमंत्री जी, आपने केवल लिखने का आव्हान किया. हम लोग तो सरकार के साथ सहकार भी करना चाहेंगे. शर्त तो नहीं लेकिन झिझक यही है कि हमारी बौद्धिक सचेष्टता को तटस्थ, निष्पक्ष भविष्य मूलक और गहरे सरोकारों के साथ जुड़ी हुई समझा जाये. आप यही चाहेंगे तो मैं इब्तिदा करने के नाम पर एक नोट आपको भेज सकता हूं और कुछ प्रतिष्ठित सबसे बढ़िया छत्तीसगढ़ियों के नाम भी.

उनमें और कुछ नाम सरकार के अधिकार के अंतर्गत जोड़े घटाए जा सकते हैं. मैं समझता हूं कि बंद कमरों में तो केवल हथियारों की रणनीति को अंजाम दिया जा सकता है. लेकिन नक्सलवाद तो खूंरेजी का खुलेआम खेल है. एक सार्थक वैचारिक जन आंदोलन छत्तीसगढ़ के राजनीतिक वातावरण को ज्यादा विषाक्त होने से बचा सकता है. जिन्हें इसी मिट्टी में दफ्न होना है उनके लिए यह एक कर्तव्यगत सरोकार है.

हम जैसे बूढ़ों के पास कम समय बचा है. उन्हें यह सरोकार और ज्यादा सघन लगता है. छत्तीसगढ़ की खनिज संपदाएं, वन, पानी, बोली, संस्कृति वगैरह तो कुदरत ने हमें दी है जिन्हें भविष्य की पीढ़ियों के लिए हमें सुरक्षित रखना है. आंख मूंदकर पूंजीपतियों को बेचना नहीं है. राजनीतिक भ्रष्टाचार, नौकरशाही के अत्याचार, प्रदूषण, शराब के ठेके, पुलिसिया जुल्म, नेताओं के चोचले, बुद्धिजीवियों की निराशा, योजनागत अदूरदशर्िता, दफ्तरी लाल फीताशाही, तरह तरह के घोटाले, सामाजिक हिंसा, बौद्धिक बौनापन, असंवेदनशीलता, संकुचित दृष्टिकोण वगैरह तो वे मानव उत्पाद हैं जिन्हें हमने खासतौर पर छत्तीसगढ़ की विश्वप्रणम्य आदिवासी संस्कृति पर लाद दिया है.

आप हमारे प्रदेश के इतिहास के उस दौर के मुख्यमंत्री हैं जब ये सभी आरोप काल हम पर थोप रहा है. संविधान के जन समर्थन और राजनीतिक दौर में आप को ये जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं. आपसे कंधे से कंधा लगाकर भविष्य को अनुकूल बनाने की जो चुनौतियां हैं उनके प्रति मेरी तरह के हर नागरिक का फर्ज़ बनता है. हमने ठीक तरह से आज तक मुख्यमंत्री निवास और मंत्रालय देखा तक नहीं है जबकि विनिबंधनुमा इस पत्र में लिखे गये मुद्दों को लेकर हमारे सचेष्ट अनुरोध रहे हैं.

मुख्यमंत्री जी, इस पत्र पर पता तो आपका है लेकिन पता नहीं इस पत्र का क्या होगा.

आपका एक मतदाता मात्र समझा जाता हुआ नागरिक

कनक तिवारी

Friday, July 10, 2009

आदिवासी लड़कियों के साथ रोज़ एक शाइनी

साभार : रविवार.कॉम

छत्तीसगढ़ की नाबालिग लड़कियों को महानगरों में घरेलू नौकरानी का काम देने के झांसे से ले जाने के बाद उन्हें अंधेरी कोठरी में ढ़केल देने का खेल सालों से चल रहा है लेकिन शाइनी आहूजा प्रकरण से यह सवाल फिर खड़ा हो गया है. अगर जशपुर, सरगुजा और कोरबा के गांवों में आप जाएं तो आपको इन इलाकों से गायब आदिवासी लड़कियों के साथ हर रोज़ एक शाइनी के किस्से मिल जाएंगे.

इसे संयोग ही कहा जाएगा कि जिस समय शाइनी आहूजा प्रकरण चर्चा में था, उसी समय लड़कियों की मंडी के कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ के जशपुर में मुंबई पुलिस का एक दल बंधक बनाई गई लड़की को छोड़ने के लिए आया हुआ था.

कुछ उत्साही पत्रकारों ने अपनी कल्पना शक्ति का सहारा लिया और छत्तीसगढ़ के अख़बारों में 19 मार्च को सुर्खियां रही कि मुम्बई के फिल्म स्टार शाइनी आहूजा ने जिस लड़की से बलात्कार किया, वह छत्तीसगढ के जशपुर जिसे के अंतर्गत आने वाले डूमरटोली गांव की रहने वाली है.

जैसा कि जशपुर के पुलिस अधीक्षक अक़बर राम कोर्राम बताते हैं- “ शाइनी आहूजा प्रकरण के बाद मुम्बई से पुलिस की एक टीम डूमरटोली आई थी, लेकिन इसका शाइनी प्रकरण से कोई सम्बन्ध नहीं है. वह एक लड़की को मुम्बई से यहां छोड़ने पहुंची थी, जो पिछले 9 मार्च से गायब थी. इस लड़की का नाम गायत्री है और वह अपनी एक सहेली अनीमा के बहकावे में आकर मुम्बई चली गई थी.”

अनीमा के कुछ परिचितों के ज़रिये गायत्री का पता चला और उसे डूमरटोली लाकर उनके परिजनों को सौंप दिया गया. लड़कियों को ट्रैफेकिंग से बचाने और उन्हें सीमित साधनों के बीच दिल्ली, मुम्बई, गोवा जैसे महानगरों से छुड़ाकर लाने वाली जशपुर की सामाजिक कार्यकर्ता एस्थेर खेस का कहना है कि शाइनी प्रकरण के बीच मुम्बई की पुलिस का जशपुर पहुंचने से यह फिर साफ़ हो गया है कि वहां बड़ी तादात में घरेलू नौकरानियों के रूप में काम करने वाली लड़कियां छत्तीसगढ़ से गई हुई हैं.

हज़ारों शिकार

सुश्री खेस कहती हैं कि शाइनी ने जिस लड़की को शिकार बनाया वह गायत्री तो नहीं है, लेकिन हमारे पास दर्जनों ऐसे मामले हैं जिनमें सबूत है कि जशपुर की लड़कियों को घरेलू काम कराने के बहाने से न केवल देश के भीतर बल्कि कुवैत और जापान तक ले जाए गए.

दिल्ली और गोवा जा पहुंची कई लड़कियों का सालों से पता नहीं है और उनके मां-बाप दलालों के दिए फोन नम्बर और पतों पर सम्पर्क नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि इनमें से ज़्यादातर फर्ज़ी हैं. लड़कियों को ले जाने के बाद प्लेसमेंट एंजेंसियों के दफ्तरों में फिर कोठियों में इन लड़कियों को 24 घंटे रखा जाता है. जब घर में पुरूष सदस्य अकेले होते है तो उनके साथ बलात्कार किया जाता है.

इनको ठीक से भोजन, कपड़ा तक नहीं मिलता, इन्हें कोई छुट्टी नहीं मिलती. इनका वेतन दलालों के पास जमा कराया जाता है. लड़कियों को अपने घर लौटने का रास्ता पता नहीं होता इसलिये वे सारा ज़ुल्म चुपचाप सहती हैं.

सुश्री खेस का यह भी कहना है कि दिल्ली में 150 से ज्यादा प्लेसमेंट एजेंसियां काम कर रही हैं जो झारखंड, पश्चिम बंगाल और उत्तर छत्तीसगढ़ से लड़कियों को बुलाते हैं. इनके एजेंट का काम इन लड़कियों के वे रिश्तेदार करते हैं, जो कई साल पहले से ही इन महानगरों में काम कर रहे होते हैं.

नया ट्रैफेकिंग कानून

छत्तीसगढ़ महिला आयोग की अध्यक्ष विभा राव राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष गिरिजा व्यास के इस बयान से सहमत हैं कि गरीब नाबालिग लड़कियों को शोषण का शिकार होने से बचाया जाए. श्रीमती राव को यक़ीन है कि अब देशभर में घरेलू नौकरानियों की सुरक्षा को लेकर नई बहस छिड़ेगी. उनका कहना है कि इस समस्या से छत्तीसगढ़ सर्वाधिक प्रभावित राज्यों में से एक है, इसलिय़े वे चाहती हैं कि ट्रैफेकिंग को लेकर भी मौजूदा कानूनों की समीक्षा की जाए और इसे रोकने के लिए प्रावधान कड़े किए जाएं.

श्रीमती राव ने शाइनी आहूजा प्रकरण में छ्त्तीसगढ़ की लड़की के शिकार होने की अफवाह के बाद जशपुर कलेक्टर और एस पी को पत्र लिखकर पूरे मामले का प्रतिवेदन देने के लिए भी कहा है.

वास्तव में घरेलू नौकरानियों की सुरक्षा व ट्रैफेंकिंग रोकने के ख़िलाफ एक कानून पिछली सरकार में ही बन जाना था. तत्कालीन केन्द्रीय महिला बाल विका मंत्री रेणुका चौधरी ने जून 2007 तक इस कानून का ख़ाका तैयार करने के लिए देशभर में सक्रिय महिला संगठनों से सुझाव मांगा था. लेकिन प्रस्ताव भेजने के बाद क्या हुआ यह किसी को नहीं मालूम.

ट्रैफेंकिंग के ख़िलाफ ही काम कर रहीं कुनकुरी की अधिवक्ता सिस्टर सेवती पन्ना का कहना है कि उनसे भी सुझाव मंगाए गए थे लेकिन उसका क्या हुआ उन्हें पता नहीं. इसमें उन्होंने महानगरों से छुड़ा कर लाई जाने वाली लड़कियों के पुनर्वास के लिए भी पुख़्ता उपाय सुझाए थे, क्योंकि देखा गया है कि महानगरों में रहकर लौटने वाली लड़कियां गांवों में व्यस्त न होने के चलते विचलित रहती हैं. वे यहां दुबारा घुल-मिल नहीं पाती और दुबारा महानगरों की तरफ भागने का रास्ता तलाश करती हैं.

बहरहाल, शाइनी आहूजा प्रकरण ने एक मौका और दिया है कि छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल से तस्करी कर महानगरों में भेजी जा रही लड़कियों की सुरक्षा के लिए ज़रूरी कदम उठाएं जाएं.

Monday, March 23, 2009

धान के कटोरे में बीड़ी

साभार : रविवार.कॉम

पंद्रह साल पहले जब मैं पहली बार शादी के बाद कांकेर जिले में मेरी पत्‍नी सुभद्रा के गांव जेपरा गया था तो मेरा स्‍वागत बीड़ी, तेंदु पत्‍ते और तम्‍बाकू से भरे एक सूपड़ा से हुआ था. यह इसलिए कि सुभद्रा के पुश्‍तैनी घर में घुसते ही बरामदे में उसकी बीड़ी बनाती हुई भाभी हमें देखकर उस सूपड़े को हाथ में लेकर स्‍वागत के लिए उठी थी.

वह वर्षा ऋतु थी जो कि धान की खेती करने वालों के लिए बहुत व्‍यस्‍त समय है. इसलिए मुझे आश्‍चर्य हुआ था कि सुभद्रा की भाभी खेत में काम करने के बजाय घर में बैठ कर चंचल उंगलियों से बीड़ी बना रही थी. उस समय बरसात के दिनों में जेपरा तक कोई मोटर वाहन नहीं चलता थी क्‍योंकि बीच में महानदी पड़ती था एवं उस पर कोई पुल नहीं था. इसलिए हम दोनों हमारे बैगों को सर पर रखकर पैदल ही 12 किलोमीटर चलकर एवं महानदी को नाव से पार कर जेपरा पंहुचे थे. फलस्‍वरूप मैंने तुरंत, मेरे हिसाब से बेमौसम, बीड़ी बनाने के इस कवायद के पीछे के रहस्‍य को जानने की कोशिश नहीं की थी. पर कुछ दिन बीतने के बाद मैंने भाभी को पूछ ही डाला कि खुद के खेत होते हुए भी वह उस में काम क्‍यों नहीं कर रही है. जो जवाब हमें मिला उसने छत्‍तीसगढ़ के छोटे एवं सीमांत किसानों की दर्दनाक हकीकत को उज़ागर कर दिया.

एक हेक्‍टेयर खेत के मालिक मेरे साले ने उस खेत को सालाना मुनाफे पर किसी और किसान को दे दिया था. इतने छोटे एक फसली खेत के लिए बैल जोड़ी एवं अन्‍य कृषि उपकरण रखने का कोई अर्थ नहीं होता है. और किराये पर बैल जोड़ी लेकर मजदूरों से काम करवाने से जो उत्‍पादन होता है, उससे ज्‍यादा खेत को मुनाफे में देकर मिल जाता है. इसके अलावा घर में ही बैठकर बीड़ी बनाकर अतिरिक्‍त कमाई भी हो जाती है जिसके लिए खेत के कीचड़ में गंदा नहीं होना पड़ता है.

छत्‍तीसगढ़ के करीब 60 प्रतशित कृषक परिवार दो हेक्‍टेयर से कम जमीन के मालिक है एवं यह भी ज्‍यादातर एक फसली है. फलस्‍वरूप इन सभी के सामने सुभद्रा के भाई के जैसे ही संकट है कि कृषि कार्य से पर्याप्‍त आमदनी नहीं हो पाती है. ऐसे में बड़ी संख्‍या में कृषक खेती बारी छोड़कर अन्‍य कृषकों को अपनी जमीन मुनाफे या भाग से दे देते है एवं खुद या तो पलायन कर जाते है और नहीं तो बीड़ी बनाकर जीवन यापन करते है. परंतु बीड़ी बनाने का काम ही क्‍यों और कुछ क्‍यों नहीं.

बीड़ी का एक प्रमुख कच्‍चा माल है तेंदु पत्ता. यह छत्‍तीसगढ़ के जंगलों में प्रभूत परिमाण में उपलब्‍ध है एवं ज्‍यादातर गरीब आदिवासियों के सस्‍ते श्रम से यह एकत्रित होता है. इन आदिवासियों के पास भी गर्मी के मौसम में तेंदु पत्‍ता एकत्रित करने के अलावा कोई दूसरा रोजगार नहीं होता है. इसलिए भूखे मरने के बजाए यह लोग बेहद सस्‍ती दरों पर यह काम करते है.

यानी छत्‍तीसगढ़ के बीड़ी निर्माता कम्‍पनियों को तेंदु पत्‍ता संग्राहक एवं घर में बैठकर बीड़ी बनाने वाले दोनों ही बहुत कम कीमत में उपलब्‍ध हो जाते है एवं वह बीड़ी भी इसलिए भारत के अन्‍य बीड़ी निर्माता कम्‍पनियों की तुलना में कम कीमत में बेच सकते है. ऐसे में आश्‍चर्य नहीं कि छत्‍तीसगढ़ में बीड़ी उद्योग फलफूल रहा है एवं परिस्थितियां ऐसी हो गई है कि नए दामादों का स्‍वागत धान से नहीं बल्कि बीड़ी के अवयवों से भरे सूपड़ों से होता है.

छत्‍तीसगढ़ में किसानी की इस दुर्दशा के पीछे एक बहुत बड़ी अंतर्राष्‍ट्रीय साजिश है. अमरीकी बहुराष्‍ट्रीय कम्‍पनियों के इशारों पर अंतर्राष्‍ट्रीय कृषि अनुसंधान केंद्रों ने रासायनिक खाद से पैदा होने वाले संकरित किस्‍म के चावलों को पूरे छत्‍तीसगढ़ में फैला दिया जिससे छत्‍तीसगढ़ की पारम्‍परिक कृषि ठप्‍प हो गई.

इस पारम्‍परिक कृषि में कमी तकनीक की नहीं बल्कि पूंजी निवेश की थी क्‍योंकि साहुकारों के चंगुल में फंसे होने के कारण छोटे किसानों के पास अपनी खेतों को विकास कर उन्‍हें दो फसली बनाने हेतु संसाधन नहीं थे. परंतु भारत सरकार साहुकारों पर लगाम कसने और पारम्‍परिक कृषि को बढ़ावा देने के बजाय बहुराष्‍ट्रीय कम्‍पनियों के व्‍यापारिक हितों को ज्‍यादा तौल दिया क्‍योंकि इन हितों के साथ छत्‍तीसगढ़ के चावल और बीड़ी बेचने वाले व्‍यापारियों के हित भी जुड़े हुए थे. आम किसान अगर आर्थिक रूप से कमजोर एवं भूखा रहता है तो श्रम का मूल्‍य भी कम रहता है जिससे देशी से लेकर विदेशी सभी प्रकार के व्‍यापारियों को फायदा होता है.

छत्‍तीसगढ़ में कृषि केवल एक जीविकोपार्जन का माध्‍यम नहीं बल्कि एक सम्‍पूर्ण जीवनशैली थी जिसमें जमीन एवं पानी का संरक्षण भी शामिल था. इसीलिए ग्रामीण समुदाय एक दूसरे से हाथ मिलाकर तालाबों और खेतों की इतनी हिफाज़त से देखभाल करते थे. परंतु जब कृषि को व्‍यापार में बदल दिया गया एवं कृषक को श्रमिक में तो यह जीवनशैली भी ध्वस्‍त हो गई एवं ग्रामीण छत्‍तीसगढ़ में बीड़ी निर्माण का बोलबाला हो गया. वर्तमान में परिस्थितियां विकराल है एवं ग्रामीण छत्‍तीसगढि़यों का औसत आय देश में सबसे कम है एवं वे विश्‍व में सब से ज्‍यादा कुपोषितों में शुमार होते है.

छत्‍तीसगढ़ सरकार द्वारा इस संकट से जूझने के लिए गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों को तीन रुपए प्रति किलो के हिसाब से 35 किलो चावल प्रति माह मुहैया कराया जा रहा है. परंतु यह एक अस्‍थायी एवं अपर्याप्‍त समाधान है. असली जरूरत यह है कि कृषि की बुनियाद को ही पुख्‍ता किया जाए ताकि छोटे किसान एक बार फिर खुशी के साथ खेती करने लगे और उसी से अपना गुजारा अच्‍छे ढंग से कर पाए.

इसके लिए अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही व्‍यापारिक दुराग्रह से ग्रसित शासन एवं नियोजन प्रणालियों को बदलकर आम जनता को स्‍वावलम्‍बी जीवन यापन करने के पूर्वाग्रह से सुशोभित शासन एवं नियोजन प्रणालियों को अपनाना होगा. बीड़ी के बदले चावल के चीले का सेवन ज्‍यादा हो इस ओर ध्‍यान देना होगा. एक हेक्‍टर भूमि वाला किसान भी उसका परिवार अच्‍छे ढंग से चला पाए इसके लिए जो कदम जरूरी है उसे अपनाना होगा. यह कदम सभी को मालूम है– इमानदारी से ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का भरपूर इस्‍तेमाल कर पारम्‍परिक कृषि एवं उससे जुड़ी विकेंद्रीकृत भू एवं जल प्रबंधन योजनाओं का क्रियान्‍वयन करना. परंतु इसे क्रियान्वित करने की इच्‍छाशक्ति लगता है जनता और शासकों में किसी में भी नहीं है और इसीलिए बीड़ी के कश लेकर ही लोग अपने दु:खों को भुलाने की कोशिश कर रहे है.

लेखक : राहुल बैनर्जी

Friday, January 9, 2009

सिंगूर के बाद अब बस्तर को टाटा ?

साभार : रविवार.कॉम

तो क्या अब बस्तर की बारी है ?

सिंगूर से टाटा संयंत्र की विदाई के बाद पिछले साढ़े तीन सालों से आदिवासियों का विरोध झेल रहा टाटा इस्पात संयंत्र अब बस्तर को भी टाटा करने की सोच रहा है. बस्तर में इस्पात संयंत्र लगाने के लिए टाटा ने 4 जून 2005 को छत्तीसगढ़ सरकार के साथ समझौता किया था लेकिन आदिवासियों के लगातार विरोध के कारण अब तक टाटा संयंत्र को बस्तर में इस्पात संयंत्र लगाने के लिए ज़मीन ही नहीं मिल पाई है.

ज़मीन के लिए आदिवासियों को मुआवजा देने और तरह-तरह के प्रलोभन देने से लेकर, झुठे मुकदमे दर्ज करने, जेल भेजने, मारने-पीटने के सारे दांव-पेंच अपनाये गये लेकिन आदिवासियों का विरोध कम होता नहीं नजर आ रहा है.

टाटा स्टील के छत्तीसगढ़ प्रोजेक्ट के उपाध्यक्ष वरुण झा की मानें तो पिछले चार सालों में भी सरकार ज़मीन उपलब्ध नहीं करा पाई है और संयंत्र की लागत लगातार बढ़ती चली गई है. ऐसे में अगर सरकार ने ज़मीन उपलब्ध कराने के लिए समय सीमा नहीं तय की तो टाटा स्टील बस्तर से विदा लेने में देर नहीं करेगी.

बस्तर में टाटा इस्पात संयंत्र पहले दिन से ही विरोध झेल रहा है. असल में राज्य सरकार के साथ हुए एमओयू ने ही इसे विवादों के केंद्र में खड़ा कर दिया था.

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में राज्य सरकार और टाटा स्टील कंपनी के बीच एक एमओयू में हस्ताक्षर के साथ घोषणा हुई कि टाटा स्टील बस्तर में 10 हजार करोड़ रुपए की लागत से प्रथम चरण में 2 मिलीयन टन और भविष्य में 3 मिलीयन टन की उत्पादन क्षमता वाला स्टील प्लांट लगाएगा.

इस्पात संयंत्र लगाए जाने के लिए भूमि अधिग्रहण की स्थिति में आदिवासियों को मुआवजा, रोजगार और पुनर्वास को लेकर जब एमओयू की पड़ताल शुरु हुई तो पता चला कि एमओयू को किसी तीसरे पक्ष को सार्वजनिक नहीं करने की शर्त भी एमओयू में है.

ट्राइबल वेलफेयर सोसायटी के क्षेत्रीय निदेशक प्रवीण पटेल कहते हैं- “ छत्तीसगढ़ सरकार ने असल में निजी कंपनियों को बस्तर से लौह अयस्क माटी के मोल देने के लिए बस्तर में इस्पात संयंत्र लगाने का ढोंग किया. टाटा की दिलचस्पी केवल आयरन ओर में है और वह इन पर कब्जा चाहती है. सरकार ने इसी कुचक्र के कारण एमओयू जैसे सार्वजनिक दस्तावेज को भी गोपनीय बना दिया. ”

श्री पटेल के अनुसार एमओयू में सरकार ने टाटा स्टील को 99 सालों तक बस्तर से आयरन ओर निकाल कर बाहर बेचने की अनुमति दे रखी है. इसलिए इस्पात संयंत्र लगाना या न लगाना कोई मायने नहीं रखता. असली मुद्दा आयरन ओर है, जिसकी दुनिया भर में कमी है और टाटा, एस्सार, मित्तल जैसी कंपनियों की नजर बस्तर के विशाल आयरन ओर खदान की तरफ लगी हुई है.

एमओयू में क्या-क्या शर्तें शामिल थीं, इसे टाटा और छत्तीसगढ़ की सरकार ही जानती है लेकिन सार्वजनिक तौर पर जो बात सामने आई, उसके अनुसार जनता की परवाह किए बिना टाटा को पानी देने, बिजली देने और आदिवासियों को रोजगार देने की बाध्यता नहीं होने की बात एमओयू में कही गई थी.

बहरहाल टाटा ने अपने लिए 5 हज़ार एकड़ से अधिक भूमि अधिग्रहण के लिए बस्तर के लोहण्डीगुड़ा इलाके के 10 गांवों का चयन किया. लेकिन पहले दौर में ही आदिवासियों ने अपनी खेती की जमीन देने से इंकार कर दिया.

इसके बाद शुरु हुआ पंचायत कानून के नाम पर पेशा का खेल और सरकार ने साम-दाम-दंड-भेद का इस्तेमाल करते हुए आदिवासियों की जमीन अधिग्रहण करने की कोशिश की. लेकिन आदिवासी सरकार से दो-दो हाथ करने के लिए सामने आ गये. टाकरागुड़ा, कुम्हली, बड़ांजी, बेलर, सिरिसगुड़ा, बड़ेपरौदा, दाबपाल, धूरागांव, बेलियापाल और छिंदगांव के ग्रामीण अपनी 2161 हेक्टेयर कृषि भूमि को किसी भी कीमत पर टाटा को देने के लिए राजी नहीं थे.

सरपंचों की अनुपस्थिति में ग्राम सभाएं हुईं, आदिवासियों के इन गांवों को पुलिस छावनी में बदल दिया गया, विरोध करने वालों को जेल भेजा गया. कुछ लोगों को मुआवजा का चेक भी दिया गया. लेकिन कई-कई बार यह सारी प्रक्रिया दुहराने के बाद भी ग्रामीण नहीं माने. और आज भी मामला जहां का तहां है.

प्रभावित गांव कुम्हली के बल्देव सिंह कहते हैं- “टाटा का संयंत्र हमारी लाश पर ही बनेगा.”

इस इलाके में ग्रामीणों के साथ आंदोलन करने वाले भाकपा के एक नेता कहते हैं- “टाटा अगर यहां से जाना चाहती है तो यह खुशी की बात है लेकिन इससे टाटा को कोई नुकसान नहीं होगा. उसे तो आयरन ओर ही चाहिए और वह तो उसे छत्तीसगढ़ सरकार किसी भी कीमत पर देगी.”

मतलब ये कि टाटा के दोनों हाथ में आयरन ओर हैं और आने-जाने के खेल में बस नफा ही नफा है.