उद्योगों के लिये पूरा जिला खाली
सुनील शर्मा जशपुर सेअगर किसी ज़िले की पूरी आबादी को विस्थापित कर दिया जाये तो ? आपके पास इसका जो भी जवाब हो, कम से कम छत्तीसगढ़ में तो इस सवाल पर भी कोई बात नहीं करना चाहता. सिवाय उन आदिवासियों के, जो डरे हुये हैं और आक्रोशित भी.
अगर सब कुछ सरकार और औद्योगिक घरानों के मुताबिक ठीक-ठाक रहा तो आने वाले दिनों में छत्तीसगढ़ की साढ़े आठ लाख की आबादी वाला जशपुर जिला पूरी तरह से खाली करवा दिया जायेगा. इन साढ़े आठ लाख लोगों में शामिल 64 फीसदी उन आदिवासियों को भी खदेड़ने की तैयारी चल रही है, जो हज़ारों साल से जशपुर के इलाके में रहते आये हैं. जशपुर के लाखों आदिवासी सरकार से सवाल पूछ रहे हैं, उनसे जवाब चाहते हैं लेकिन राजधानी रायपुर से लेकर दिल्ली तक उनकी गुहार अनसुनी रह जा रही है.गरीबी, लाचारी और अभावों की दिशा में नया इतिहास गढ़ने वाले इस जिले ने देश को कई आईएएस, आईपीएस के साथ कई उच्चाधिकारी दिये हैं लेकिन इनकी ताकत भी जशपुर में कमजोर पड़ रही है. जशपुर के भूगर्भ में खनिज संपदाओं का विपुल भंडार तो है ही यहां की नदियों में प्राकृतिक स्वर्णकण भी पाये जाते हैं. लेकिन प्रकृति की यह विरासत ही इन आदिवासियों के लिये मुश्किल का सबब बन गई है.
पिछले कुछ सालों से इस जिले में औद्योगिक घरानों ने अंधाधुंध तरीके से अपने विस्तार की तैयारी शुरु की है. यहां आने वाले 122 बड़े उद्योगों ने सरकार से उद्योगों की स्थापना के लिए 6023 वर्ग किलोमीटर जमीन की मांग की है. और जानते हैं, जिले का पूरा क्षेत्रफल कितना है ? कुल 6205 वर्ग किलोमीटर. यानी केवल 182 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र ऐसा है, जिसे औद्योगिक घराने बचे रहने देना चाह रहे हैं.
जाहिर है, जिले की लगभग साढ़े आठ लाख की आबादी के पास, ऐसी स्थिति में कई सवाल हैं. आखिर सब कुछ खाली हो जायेगा तो लोगों का क्या होगा ? लोग कहां जाएंगे ? खेती की जमीन छीन जायेगी तो खेती किसमें करेंगे और खायेंगे क्या ?
हाल देश का
एक बड़ा सवाल तो यही है कि आखिर विकास की सारी विपदा आदिवासियों के हिस्से ही क्यों हैं ? देश में साढे आठ करोड़ सूचीबद्ध आदिवासी हैं जबकि ढाई करोड़ गैर सूचीबद्ध (डिनोटीफाइड)हैं यानी कुल लगभग 11 करोड़ आदिवासी हैं. पर इन आंकड़ों में सबसे महत्वपूर्ण है आदिवासियों का विस्थापन. जानकारों की मानें तो प्रत्येक दस में से एक आदिवासी आज वहां नहीं है, जहां वह पैदा हुआ था, जहां उसकी संस्कृति फल-फूल रही थी. न उसके पास अब जमीन है और न जंगल. पिछले एक दशक की ही बात लें तो औद्योगिक परियोजनाओं की स्थापना के कारण देश के महज चार राज्यों आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ, झारखंड और उडीसा में 14 लाख लोग विस्थापित हुये. इनमें 79 प्रतिशत लोग आदिवासी थे. तथ्य बताते हैं कि इस लोकतांत्रिक राष्ट्र में जनता के प्रति प्रतिबद्धता दर्शाने वाली सरकार ने 66 प्रतिशत विस्थापितों का पुनर्वास तक नहीं किया और उन्हें उनके हाल पर जानवरों की तरह मरने-जीने के लिये छोड़ दिया.
डा.एम.एम.स्वामीनाथन द्वारा तैयार 'ड्राफ्ट पेपर' में चौंकाने वाले तथ्य हैं. यह रिपोर्ट बताती है कि देश में औद्योगीकरण और विकास से संबंधित विभिन्न परियोजनाओं के कारण वर्ष 1990 तक की अवधि में जो आदिवासी विस्थापित हुए उनका पूरी तरह पुनर्वास नहीं हुआ. विस्थापित आदिवासियों की कुल संख्या 85.39 लाख रही, जो कुल विस्थापितों का 55.16 प्रतिशत थी. विस्थापित आदिवासियों में 64.23 प्रतिशत अब भी पुनर्वास से वंचित है और अपनी जमीन एवं जड़ से उखडे हैं.
ऐसे में भला छत्तीसगढ़ अलग कैसे होता ! छत्तीसगढ़ में भी सरकार उसी परंपरा के पालन की कोशिश कर रही है, जिसमें आदिवासियों की छाती पर उद्योग लगा कर कथित विकास की इबारत दर्ज की जाती है.
जीवन का अधिग्रहण
जशपुर में औद्योगिक घरानों के लिये जमीन अधिग्रहण के खिलाफ शुरू से ही संघर्षरत सेवती पन्ना को जैसे सब कुछ मुंहजुबानी याद है. वह बताती हैं- "2008 में जमीन अधिग्रहण के लिए बगीचा ब्लाक के तेरह पंचायतों को नोटिस भेजा गया. इसमें गुल्लू भी शामिल था, जहां हाईड्रोइलेक्ट्रिक पावर प्लांट बनाने की तैयारी की जा रही है. नोटिस पंचायतों के सरपंच-सचिव के हाथ में दिया गया. तब तक उन्हें यह भी मालूम नहीं था कि जमीन अधिग्रहण क्या होता है ? नोटिस में साफ शब्दों में लिखा था कि यदि वे जमीन अधिग्रहण के संबंध में 7 अगस्त 2008 तक न्यायालय के समक्ष पंचायत का अभिमत पेश नहीं करेंगे तो उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी. लोग घबरा गए. उन्होंने पहले तो सभी तेरह पंचायतों की एक बैठक बुलाई फिर एक निजी कंपनी में बतौर असिस्टेंट मैनेजर काम कर चुके एक बुजुर्ग से इस बाबत सलाह ली. बुजुर्ग ने कंपनियों के जमीन अधिग्रहण की मंशा को स्पष्ट किया. बाद में खनिज संसाधनों का उत्खनन रोकने ग्रामीणों ने खुद से ही तहसील में जाकर उस नोटिस का जवाब दिया.’’
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