Saturday, March 13, 2010

नक्सलियों से छत्तीसगढ़ के सवाल


कनक तिवारी

इसमें इसमें कोई शक नहीं कि नक्सलवाद का सबसे सघन और भविष्यमूलक हमला छत्तीसगढ़ पर हो गया है. यह असर देश के सबसे बड़े भौगोलिक राज्य मध्यप्रदेश के इस दक्षिण पूर्वी हिस्से पर ही महसूस किया जाता था, लेकिन अविभाजित मध्यप्रदेश की लगभग 27 प्रतिशत की आबादी के आधार पर बने छत्तीसगढ़ के तिहाई हिस्से में नक्सलवाद की सक्रिय, चिंताजनक और विवादग्रस्त उपस्थिति है. 'नक्सलवाद' और 'माओवाद' शब्दों का घालमेल समझना जरूरी है.

सोवियत गणराज्य और चीन समेत पूर्वी यूरोप तथा कुछ लातीनी अमेरिकी और दक्षिण एशियाई मुल्कों में मार्क्सवाद के बौद्धिक सिद्धांतों का परिणामकारी कम्युनिस्ट आंदोलन जीवन्त रहा है. इनमें से मुख्यत: चीन ने माओ त्से तुंग के नेतृत्व और उनसे भी ज्यादा उनके उत्तराधिकारी लिन पियाओ के बेहद हिंसात्मक दर्शन 'दुश्मन का उन्मूलन करो' का पाठ साकार करने की कोशिश की. नतीजतन सोवियत रूस के नेतृत्व से छिटकर चीन अपनी अहमियत का देश बना. उसने गुरिल्ला युद्ध की छापामार शैली को अपनाते हुए हिंसा की इतनी तल्ख वकालत की कि उसके राजदर्शन में असहमति का कोई स्थान ही नहीं रहा.

रूस और चीन के खेमों में कम्युनिस्ट आन्दोलन के बंट जाने का असर 1964 के आसपास भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के विभाजन और बाद में उसके कई धड़ों में टूटते जाने से हुआ. जिस तरह किसान मजदूर प्रजा पार्टी जैसी समाजवादी पार्टी के इतने धड़े हुए कि उन्हें गिन पाना मुश्किल हुआ, वही भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के साथ भी हुआ.

1960 के दशक में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से उपजा चारु मजूमदार, कनु सान्याल, जंगल सन्थाल और सुशीतल राय चौधरी वगैरह दर्जनों बुद्धिजीवियों के नेतृत्व में कोलकाता के महाविद्यालयीन परिसरों में नक्सलवाद पुष्ट हुआ. 1972 के आसपास कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय के नेतृत्व में उसे इतनी बुरी तरह कुचल दिया गया जिसकी नक्सलियों को कल्पना नहीं रही होगी. सिद्धार्थ बाबू लेकिन चाणक्य नहीं थे. उन्हें घास की जड़ों में मठा डालने की भविष्यमूलकता नहीं मालूम थी. लिहाजा नक्सली आंदोलन नागभूषण पटनायक और नागी रेड्डी जैसे उड़ीसा और आंध्रप्रदेश के कई माओवादी नेताओं के हत्थे चढ़ गया. उसके बाद धीरे धीरे फैलता हुआ यह आंदोलन तत्कालीन मध्यप्रदेश के छत्तीसगढ़ अंचल में प्रवेश कर गया.

उसका एक बड़ा कारण आंध्रप्रदेश की सरकार का रवैया था जिसकी कड़ाई की वजह से नक्सलियों को आंध्र की सीमा पार कर छत्तीसगढ़ आना अनुकूल हुआ. भोपाल से बस्तर की दूरी ने प्रशासन को वैसे ही ढीला ढाला रखा. कुल मिलाकर वह नक्सलियों के लिए अप्रत्यक्ष वरदान ही हुआ.

छत्तीसगढ़ में लगभग 30 वर्षों में पला बढ़ा नक्सली आंदोलन अब बौद्धिक-राजनीतिक कम लेकिन यौद्धिक तेवर का ज्यादा दिखाई देता है. माओ और लेनिन ने यथासम्भव सुशिक्षित जनता की भागीदारी के बगैर जन आंदोलन का कभी समर्थन नहीं किया. माओ ने सदैव कहा कि जनता में क्रांति का आशय बुनियादी और अंतिम तौर पर जनता के राजनीतिक शिक्षण से है.

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