Friday, January 9, 2009

सिंगूर के बाद अब बस्तर को टाटा ?

साभार : रविवार.कॉम

तो क्या अब बस्तर की बारी है ?

सिंगूर से टाटा संयंत्र की विदाई के बाद पिछले साढ़े तीन सालों से आदिवासियों का विरोध झेल रहा टाटा इस्पात संयंत्र अब बस्तर को भी टाटा करने की सोच रहा है. बस्तर में इस्पात संयंत्र लगाने के लिए टाटा ने 4 जून 2005 को छत्तीसगढ़ सरकार के साथ समझौता किया था लेकिन आदिवासियों के लगातार विरोध के कारण अब तक टाटा संयंत्र को बस्तर में इस्पात संयंत्र लगाने के लिए ज़मीन ही नहीं मिल पाई है.

ज़मीन के लिए आदिवासियों को मुआवजा देने और तरह-तरह के प्रलोभन देने से लेकर, झुठे मुकदमे दर्ज करने, जेल भेजने, मारने-पीटने के सारे दांव-पेंच अपनाये गये लेकिन आदिवासियों का विरोध कम होता नहीं नजर आ रहा है.

टाटा स्टील के छत्तीसगढ़ प्रोजेक्ट के उपाध्यक्ष वरुण झा की मानें तो पिछले चार सालों में भी सरकार ज़मीन उपलब्ध नहीं करा पाई है और संयंत्र की लागत लगातार बढ़ती चली गई है. ऐसे में अगर सरकार ने ज़मीन उपलब्ध कराने के लिए समय सीमा नहीं तय की तो टाटा स्टील बस्तर से विदा लेने में देर नहीं करेगी.

बस्तर में टाटा इस्पात संयंत्र पहले दिन से ही विरोध झेल रहा है. असल में राज्य सरकार के साथ हुए एमओयू ने ही इसे विवादों के केंद्र में खड़ा कर दिया था.

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में राज्य सरकार और टाटा स्टील कंपनी के बीच एक एमओयू में हस्ताक्षर के साथ घोषणा हुई कि टाटा स्टील बस्तर में 10 हजार करोड़ रुपए की लागत से प्रथम चरण में 2 मिलीयन टन और भविष्य में 3 मिलीयन टन की उत्पादन क्षमता वाला स्टील प्लांट लगाएगा.

इस्पात संयंत्र लगाए जाने के लिए भूमि अधिग्रहण की स्थिति में आदिवासियों को मुआवजा, रोजगार और पुनर्वास को लेकर जब एमओयू की पड़ताल शुरु हुई तो पता चला कि एमओयू को किसी तीसरे पक्ष को सार्वजनिक नहीं करने की शर्त भी एमओयू में है.

ट्राइबल वेलफेयर सोसायटी के क्षेत्रीय निदेशक प्रवीण पटेल कहते हैं- “ छत्तीसगढ़ सरकार ने असल में निजी कंपनियों को बस्तर से लौह अयस्क माटी के मोल देने के लिए बस्तर में इस्पात संयंत्र लगाने का ढोंग किया. टाटा की दिलचस्पी केवल आयरन ओर में है और वह इन पर कब्जा चाहती है. सरकार ने इसी कुचक्र के कारण एमओयू जैसे सार्वजनिक दस्तावेज को भी गोपनीय बना दिया. ”

श्री पटेल के अनुसार एमओयू में सरकार ने टाटा स्टील को 99 सालों तक बस्तर से आयरन ओर निकाल कर बाहर बेचने की अनुमति दे रखी है. इसलिए इस्पात संयंत्र लगाना या न लगाना कोई मायने नहीं रखता. असली मुद्दा आयरन ओर है, जिसकी दुनिया भर में कमी है और टाटा, एस्सार, मित्तल जैसी कंपनियों की नजर बस्तर के विशाल आयरन ओर खदान की तरफ लगी हुई है.

एमओयू में क्या-क्या शर्तें शामिल थीं, इसे टाटा और छत्तीसगढ़ की सरकार ही जानती है लेकिन सार्वजनिक तौर पर जो बात सामने आई, उसके अनुसार जनता की परवाह किए बिना टाटा को पानी देने, बिजली देने और आदिवासियों को रोजगार देने की बाध्यता नहीं होने की बात एमओयू में कही गई थी.

बहरहाल टाटा ने अपने लिए 5 हज़ार एकड़ से अधिक भूमि अधिग्रहण के लिए बस्तर के लोहण्डीगुड़ा इलाके के 10 गांवों का चयन किया. लेकिन पहले दौर में ही आदिवासियों ने अपनी खेती की जमीन देने से इंकार कर दिया.

इसके बाद शुरु हुआ पंचायत कानून के नाम पर पेशा का खेल और सरकार ने साम-दाम-दंड-भेद का इस्तेमाल करते हुए आदिवासियों की जमीन अधिग्रहण करने की कोशिश की. लेकिन आदिवासी सरकार से दो-दो हाथ करने के लिए सामने आ गये. टाकरागुड़ा, कुम्हली, बड़ांजी, बेलर, सिरिसगुड़ा, बड़ेपरौदा, दाबपाल, धूरागांव, बेलियापाल और छिंदगांव के ग्रामीण अपनी 2161 हेक्टेयर कृषि भूमि को किसी भी कीमत पर टाटा को देने के लिए राजी नहीं थे.

सरपंचों की अनुपस्थिति में ग्राम सभाएं हुईं, आदिवासियों के इन गांवों को पुलिस छावनी में बदल दिया गया, विरोध करने वालों को जेल भेजा गया. कुछ लोगों को मुआवजा का चेक भी दिया गया. लेकिन कई-कई बार यह सारी प्रक्रिया दुहराने के बाद भी ग्रामीण नहीं माने. और आज भी मामला जहां का तहां है.

प्रभावित गांव कुम्हली के बल्देव सिंह कहते हैं- “टाटा का संयंत्र हमारी लाश पर ही बनेगा.”

इस इलाके में ग्रामीणों के साथ आंदोलन करने वाले भाकपा के एक नेता कहते हैं- “टाटा अगर यहां से जाना चाहती है तो यह खुशी की बात है लेकिन इससे टाटा को कोई नुकसान नहीं होगा. उसे तो आयरन ओर ही चाहिए और वह तो उसे छत्तीसगढ़ सरकार किसी भी कीमत पर देगी.”

मतलब ये कि टाटा के दोनों हाथ में आयरन ओर हैं और आने-जाने के खेल में बस नफा ही नफा है.